रस तथा भाव पर विशेषज्ञों की राय

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रस-भाव

रस तथा भाव पर विशेषज्ञों की राय


लोल्लट


लोल्लट का रस सिद्धान्त 'उत्पत्तिवाद' के नाम से विख्यात है। लोल्लट ने सर्वप्रथम भरत के रस-परक सिद्धान्त की व्याख्या की। भरत सूत्र की व्याख्या उन्होंने इस इस प्रकार की 'संयोगात्' अर्थात् कार्यकारण भाव रूप सम्बन्ध तथा 'निष्पत्ति' अर्थात् उत्पत्ति। चूंकि लोल्लट मीमांसक थे इसलिए उन्होंने कार्यकारण वाद की कल्पना पर उत्पत्तिवाद को जन्म दिया। विभाव अनुभाव ग्रादि उत्पादक हैं और रस उत्पाद्य। उनके अनुसार जो भाव नाविका (आलम्बन विभाव) द्वारा उत्पादित होता है तथा उद्दीपन व संचारी भावों से पुष्ट होता है, वही भाव रस रूप में उत्पन्न होता है। यह रस नट या सामाजिक (इष्टा, श्रोता) के हृदय में पैदा नहीं होता वरन् राम या दुष्यन्त बना पात्र ही इस रस का अनुभव करते हैं। इस प्रकार रस की स्थिति वे राम आदि पात्रों में मानते हैं न कि सहृदयों में। अभिनेता जिस पात्र को जीता है उस पात्र में रस रहता है, सहृदय लोग भ्रांति से उसअभिनेता को राम अथवा दुष्यन्त समझ लेते हैं और आनन्दित होते हैं। अभिनेता या नट तो रस प्रतीति कराने का एक माध्यम मात्र हैं। लोल्लट का यह मत पूर्ण नहीं है। मानना ही इसका दोष है। पात्रों में सामाजिक में रस की स्थिति न रस की स्थिति मानना ठीक नहीं है, क्योंकि राम आदि पात्र तो अतीत में थे। वर्तमान समय में तो रसास्वादन कर्ता सामाजिक ही है। यदि अभिनेता स्वयं रस में डूब कर अभिनय न करे तो सही भाव पैदा ही नहीं होंगे। हम कई बार नाटक देखकर कहते हैं कि राम का अभिनय प्रभावित नहीं कर सका, आनन्द नहीं आया। इसका अर्थ यही है कि अभिनेता ने सजीव, सरस अभिनय नहीं किया। यदि पात्र में ही रस होता तो अभिनय चाहे जैसा होने पर भी रस की स्थिति बनी रहनी चाहिए थी। इसके अलावा लोल्लट की विभावादि तथा रस में कार्यकारण बाद की जो कल्पना है उसका खण्डन भी अभिनवगुप्त ने किया है।


शंकुक


शंकुक का मत 'अनुमितिवाद' के नाम से प्रसिद्ध है। शंकुक मूलतः नैयाविक थे। इन्होंने सर्वप्रथम लोल्लट के मत का खण्डन किया। लोल्लट के अनुसार विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभाव रस की अनुमिति कराते हैं। जैसे हम पर्वत पर धुआ देखकर यह अनुमिति करते हैं कि पर्वत पर अग्नि है, उसी प्रकार नट में रामादि के समान देखकर हम उसमें रस की अनुमिति करते हैं। इस प्रकार विभावादि रस के 'अनुमापक' हैं न कि 'कारण', इसी प्रकार रस 'कार्य' न होकर 'अनुमाप्य' है। जिस प्रकार चित्र में घोड़ा वास्तविक न होने पर भी हमें उसे थोड़ा मानना पड़ता है, उसी प्रकार नट राम नहीं होता फिर भी सामाजिक उसे राम समझता है। नट के द्वारा भाव का प्रकाशन देखकर अनुमान कर लेता है कि उसके हृदय में भाव रसरूप में परिणत हो रहे हैं। यह अनुभूति अनुभव करते समय रसपूर्ण होती है इसलिए सामाजिक स्वयं भी रसानुभूति (रसानुभव) करने लगता है। 'निष्पत्ति' का अर्थ है 'अनुमिति' ।

शंकुक भी मूलरूप में रस पात्रों में ही मानते हैं, परन्तु उन्होंने लोल्लट की भौति सामाजिकों को सर्वथा रसशून्य नहीं माना है। शंकुक के अनुसार भ्रांति से रस का अनुमान नट में किया जाता है, परन्तु सहृदयों का अनुभव बताता है कि रसों को साक्षात अनुभव किया जाता है। रस प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है। अतः रस की केवल अनुमान के आधार पर कल्पना करना ठीक नहीं है।



भट्टनायक


भट्टनायक ने रस के सम्बन्ध में 'भुक्तिवादी' सिद्धान्त दिया है। ये रस के सम्बन्ध में उत्पत्ति, अनु‌मिति अथवा अभिव्यक्ति वाले सिद्धान्तों को नहीं मानते हैं। इन्होंने भरतोक्त रससूत्र के 'संयोगात्' व 'निष्पत्ति' शब्दों के भिन्न अर्थ लिए हैं। उनके अनुसार संयोगात् का अर्थ है 'भाव्यभावक सम्बन्ध' और निष्पत्ति का अर्थ है 'मुक्ति' (आस्वाद)। वे रस की स्थिति सहृदय में पूर्णतः सिद्ध करते हैं। भट्टनायक सांख्यमतानुयायी थे तथा साधारणीकरण सिद्धान्त के प्रथम प्रवर्तक। उनके इसी सिद्धान्त का आगे चलकर अभिनवगुप्त ने विस्तार किया। भट्टनायक के अनुसार विभाव, अनुभाव आदि रस के 'भोजक' हैं तथा रस 'भोज्य'। उन्होंने 'भावकत्व व्यापार' तथा 'भोजकत्व व्यापार' शब्दों का प्रयोग किया है।

भट्टनायक के अनुसार सामाजिक सर्वप्रथम काव्य की अभिधा शक्ति द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त करता है, फिर रामादि पात्रों की भावना के साथ अपनी भावना का तादात्म्य करता है, यह भावकत्व व्यापार है, जिसके द्वारा रामादि पात्र अपना व्यक्तित्व छोड़कर साधारणीकृत हो जाते हैं। इस समय सहृदय की बुद्धि में रजस् और तमस् गुण नष्ट हो जाते हैं, केवल सत्व रहता है। अतः वह लौकिक इच्छाओं में स्वतन्त्र हो जाता है। उसे जो रसास्वादन होता है, उसका साधन है भोजकत्व व्यापार। अभिनव गुप्त ने इसके विरोध में कहा है कि भावकत्व व्यापार तथा भोजकत्व व्यापार का कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं है। अतः यह कल्पना है।

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