कला का अर्थ : भाग ४

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 कला का अर्थ 

भाग ४

कला तथा सौन्दर्य


               सौन्दर्य अपने आप में एक विस्तृत शब्द है जिसका अपना स्वतन्त्र शास्त्र (सौन्दर्यशास्त्र) तथा सिद्धान्त हैं । यहाँ हम कला तथा सौन्दर्य के संबंधो पर, सौन्दर्य का कला में क्या स्थान व महत्त्व है, इसका विश्लेषण करेंगे । रवीन्द्रनाथ ने लावण्य को एक तत्त्व के रूप में लिया है, यही लावण्य है जिसे हम सौन्दर्य कह सकते हैं। सौन्दर्य कला का प्राण है, यदि यह कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कला का अन्तिम उद्देश्य यद्यपि श्रध्यात्मिकता है, तथापि सौन्दर्य की उपस्थिति भी अनिवार्य है। प्रमाण, कल्पना, प्रतीकों, रंगों, उपमाओं, प्राकृतिक दृश्यों का सहारा कलाकार अपनी कृति को सुन्दर बनाने के लिए ही लेता है। दृश्य जगत में बहुत से ऐसे तत्त्व हैं, जिन्हें हम असुन्दर, घृणित अथवा भयावह कहते हैं। पर जब एक कवि अथवा चित्रकार उसे ही अपने माध्यमसे साकार करता है तो वे घृणित अथवा असुन्दर नहीं लगते। बाढ़ से उत्पन्न दृश्य बड़ा डरावना होता है, उसी प्रकार युद्ध में हताहतों को हम देख नहीं सकते पर चित्रकार उसे ही इतने मार्मिक व सुन्दर तरीके से चित्रित करते हैं कि उसमें सौन्दर्य दिखाई देता है। शब्दों के माध्यम से कवि किसी भी विषय का समूचा दृश्य उपस्थित करता है और हम दाद देते हैं ।

                 विभिन्न कला के कलाकारों ने यह साबित किया है कि जिन वस्तुओं को हम असुन्दर कहते हैं वे भी कला के रूप में निर्मित होने पर केवल सौन्दर्य बिखेरती हैं। चित्रकार, मूर्तिकार अथवा कवि आदि अपने मनोबल, रुचि तथा कुशलता द्वारा असुन्दर को सुन्दर बना देता है। कला कभी असुन्दर नहीं होती । प्रायः देखा जाता है कि घरों में स्त्रियाँ त्यौहार व विवाहादि अवसरों पर जैसे करवा चौथ, नाग पंचमी आदि पर दीवार पर चित्र बनाती हैं, पर उन्हें कला की श्रेणो में क्यों नहीं रखते ? कारण स्पष्ट है कि उनमें सौन्दर्य का अभाव होता है। न हम उनकी कृति को कला कहते हैं, न उन्हें कलाकार । कला व सौन्दर्य का सम्बन्ध बहुत प्राचीन है। सौन्दर्य के अभाव में कला को कला नहीं कहा जा सकता। कला रूप है तो सौंदर्य उसका प्राण है। कला की श्रेयसता उसकी उपयोगिता पर निर्भर है तो प्रेयसता का मूल है उसका सौन्दर्य । सौन्दर्य ही वह तत्त्व है जिससे व्यक्ति को आनन्द व तोष की प्राप्ति होती है। आनन्दानुभूति अथवा रसानुभूति का आधार भी यही सौन्दर्य है। ताजमहल देखकर अथवा वृन्दावन बाग देखकर हम आनन्दित होते हैं, इस आनन्द का आधार उसका सौन्दर्य ही है। श्वेत संगमरमर का पत्थर, उस पर की गई नक्काशी, जाली झरोखे आदि जो सौन्दर्य पैदा करते हैं, हम वही देखकर प्रसन्न होते हैं। अतः सौन्दर्य के माध्यम से कलाएँ आनंद प्रदान करने को ओर उन्मुख रहती हैं और कलाकार अपनी कृति को अधिकाधिक सुन्दर बनाने में जुटा रहता है। अनुभूति से अभिव्यंजना, अभि- व्यंजना से रसोद्र क, रसोद्रक से सौन्दर्यानुभूति एवं सौन्दर्यानुभूति से चिर आनन्द की प्राप्ति कराना ही कला का कार्य है। अतः स्पष्ट है सौन्दर्य बिना यह आनंद संभव नहीं।


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