संगीत सिद्धांत

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संगीत-सिद्धांत

संगीत सिद्धांत 

आचार्य बृहस्पतिकृत भरत का संगीत सिद्धान्त


भरत का संगीत सिद्धान्त ग्रन्थ आचार्य बृहस्पति द्वारा लिखित है। इसका प्रथम प्रकाशन 1959 में, प्रकाशन शाखा, सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा किया गया था। दूसरा संस्करण 1989 में बृहस्पति पब्लिकेशन्स, D/4-C, डी.डी.ए. फ्लैट्स, मुनीरिका, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ। यह ग्रन्थ छह अध्यायों में है। छठे अध्याय में अनुबन्ध (1), अनुबन्ध (2), अनुबन्ध (3), अनुबन्ध (4) भी दिये गये हैं। इस ग्रन्थ में मूल रूप से नाट्यशास्त्र में भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित कुछ विषयों को लेकर उनका खुलासा किया है, जिसके अंतर्गत भरतमुनि की धारणाओं को समझाकर वर्तमान समय में उनकी प्रयोगविधि भी बताई हैं।

पहले अध्याय में लेखक ने ग्राम, श्रुति और स्वर पर विचार किया है। ग्राम को देखें तो भरत ने केवल षड्ज और मध्यम ग्राम वर्णन किया है। उन्होंने गान्धार ग्राम की चर्चा नहीं की है, लेकिन इस ग्रंथ में लेखक द्वारा यह स्पष्ट रूप से बतलाया है कि भरत ने श्रुतियों की व्यवस्था संवादित्व के आधार पर की है। पहले क्रियात्मक रूप से देख लिया कि कौन-कौन-से स्वर परस्पर संवादी हैं, फिर उन्होंने यह जानने की चेष्टा की कि संवादी स्वर कितनी श्रुतियों के अन्तर पर स्थित हैं, फिर क्रमशः उन्होंने प्रत्येक स्वर की श्रुति संख्या प्राप्त की।


           लेखक ने पहले यह दिखलाया है कि किस प्रकार नवतन्त्री विपञ्ची वीणा पर षड्ज, ऋषभ, भरतोक्त शुद्ध गान्धार, अन्तर गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद और | काकली निषाद प्राप्त होते हैं। । इस अध्याय का 'श्रुति-दर्शन-विधान' बहुत ही पाण्डित्यपूर्ण है। इसमें लेखक ने पहले भरत की चतुः सारणाएं विस्तारपूर्वक समझायी हैं और यह दिखलाया है कि उनसे किस प्रकार श्रुतियों की संख्याएं प्राप्त होती हैं। इसके अनन्तर लेखक ने यह दिखलाया है कि उनके द्वारा निर्मित ' श्रुतिदर्पण' वाद्य पर किस प्रकार समस्त सारणाएं सम्पन्न हो जाती हैं और श्रुतियों की संख्याएं सरलतापूर्वक प्राप्त हो सकती हैं।


           दूसरे अध्याय में मूर्च्छना की व्युत्पत्ति एवं लक्षण बताये हैं। इस अध्याय में लेखक ने यह सिद्ध किया है कि सप्तस्वरता मूर्च्छना का मुख्य लक्षण है। इसमें मूर्च्छनाओं के प्रयोजन को लेखक ने बहुत सुन्दर रीति से समझाया है। इतना विशद और पाण्डित्यपूर्ण वर्णन अन्यत्र नहीं मिलता। जाति विशेष के लिए मूर्च्छना-विशेष का पाश्चात्यकालीन नियम और उसका प्रयोजन बताया है साथ ही द्वादश स्वर मूर्च्छनावाद और उसकी पाश्चात्यकालीन आलोचना की गई है। इसे विस्तारपूर्वक समझाया है। मतंग किन्नरी, जाति विशेष के लिए मूर्च्छना विशेष का मतंगकृत निर्देश, तन्त्रीवाद्यों पर मूर्च्छनाओं की स्थापना के प्रकार इत्यादि के बारे में बताया गया है।

तीसरे अध्याय में जाति लक्षण और जातियों के भेद, जाति के दस लक्षण, जिसमें ग्रह, अंश, तार, मन्द्र, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, षाडवत्व और औडुवत्व के नियमों द्वारा स्वर सन्निवेश किया गया हो, वह 'जाति' है। आचार्य बृहस्पतिजी ने इन दस लक्षणों को इस गन्ध में भली-भांति समझाया है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण लक्षण अंश-स्वर है। अंश-स्वर के ही महत्व को समझने से 'जाति' का रहस्य समझ में आ सकता है। लेखक ने इन सब लक्षणों को समझाते हुए जाति-गान और वादन पर सुन्दर प्रकाश डाला है। उन्होंने अठारह जातियों का विस्तृत वर्णन किया है। चतुर्थ अध्याय में लेखक ने संगीत-रत्नाकार में दिये हुए जाति प्रस्तारों को विशद रूप से समझाकर लिखा है और उनके अनुसार स्वरलिपि से जातियों का प्रत्यक्षीकरण किया है। इसमें षडजी-प्रस्तार, आर्षभी प्रस्तार, गान्धारी-प्रस्तार, मध्यमा-प्रस्तार, पञ्चमी-प्रस्तार, धैवती प्रस्तार, नैषादी प्रस्तार, षड्जकैशिकी-प्रस्तार, आन्ध्री-प्रस्तार, नन्दयन्ती प्रस्तार इत्यादिके बारे में बताया गया है। पंचम अध्याय में स्वर-साधारण और जाति-साधारण का विस्तृत रूप से स्पष्टीकरण किया गया है। लेखक ने एक मण्डल-प्रस्तार में साधारण स्वरों का श्रुति-स्थान भली-भांति समझाया है।'


           छठे अध्याय में राग का विशद वर्णन किया है। इन्होंने पहले राग की परिभाषा समझायी है और फिर यह बतलाया है कि भरतोक्त ग्राम राग जाति से उत्पन्न हुए हैं। तदुपरांत कश्यप एवं शारंगदेव का विधान, आलाप, करण, पद, आक्षिप्तिका, मतंग एवं मोक्षदेव के विधान, कैशिक मध्यम अथवा शुद्ध कैशिक मध्यम, शारंगदेव एवं मोक्षदेव के विधान भी बताये हैं। फिर आक्षिप्तिका, ग्रामरागों के प्रकार, उपराग, राग, भाषाजनक ग्रामराग- भाषाएं, विभाषाएं, अन्तरभाषाएं इत्यादि के बारे में बताया गया है। उपर्युक्त छह अध्यायों में भरत-सिद्धान्त का पूर्णरूप से प्रतिपादन हुआ है। इसके बाद चार प्रकार के अनुबन्ध दिये गये हैं। इनके पहले अनुबन्ध में भरत-सिद्धान्त में आये हुए पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या है, जैसे-ताल, क्रिया, मार्ग, लय, यति, आलाप इत्यादि का वर्णन किया है। दूसरे अनुबन्ध में रस-सिद्धान्त को संक्षेप में समझाया गया है और भिन्न- भिन्न रसों का विशिष्ट स्वर सन्निवेशों से सम्बन्ध बतलाया गया है। तीसरे में श्रुतियों की अनन्तता और देशी रागों में प्रयोज्य ध्वनियां बतलायी गयी हैं और मूर्छना तथा आधुनिक ठाठों की स्वर-विश्लेषण द्वारा तुलना की गयी है। चौथे में भारतीय संगीत के 15वीं ई. तक के शास्त्रकारों, जैसे- ब्रह्मा-शिव, शंकर-पार्वती, शिवा-नन्दिकेश्वर-नारद-स्वाति, विशाखिल, पाश्र्वदेव, गोपालनायक इत्यादि शास्त्रकारों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।

इस प्रकार इस ग्रंथ के अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि यह ग्रन्थ बहुत खोज के साथ लिखा गया है। भरत- सिद्धान्त को समझने के लिए यह अत्युत्तम कृति है। लेखक ने इसकी रचना करके संगीत के विद्यार्थियों को अमूल्य निधि प्रदान की है। आचार्य बृहस्पतिजी द्वारा छह अध्यायों में निर्मित 'भरत का संगीत सिद्धान्त' नामक यह ग्रंथ भरतमुनि के सिद्धान्तों को सरल करके समझाने में तथा उन सिद्धान्तों की वर्तमान प्रयोगविधि बताने में सहायक है।

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