पखावज का इतिहास-एवं विकास

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पखावज-का-इतिहास-एवं-विकास

 पखावज का इतिहास-एवं विकास


पखावज - पखावज के इतिहास पर विचार करते समय भरत नाट्य-शास्त्र में वर्णित एक घटना की ओर प्रायः ध्यान आकृष्ट हो जाता हैं । एक दिन स्वाति ऋषि पुष्कर तट पर जल लेने गए। संयोग से उसी समय वर्षा होने लगी । पुष्कर सरोवर और उसमें फैले भिन्न भिन्न आकार-प्रकार के कमल पत्रों और पुष्पों पर आकाश से गिरती जल की बूँदो ने जिन भिन्न-भिन्न ध्वनियों को जन्म दिया, उससे ऋषि को एक सर्वथा नवीन वाद्य के आविष्कार की प्रेरणा मिली। उन्हीं के निर्देश पर विश्वकर्मा ने एक ऐसे अवनद्ध वाद्य का निर्माण किया जो तीन भागों में विभक्त था। एक भाग उर्ध्वमुखी होने के कारण उर्ध्वक कहलाया जबकि, दूसरा भाग उर्ध्वक से आलिंगित होने के कारण आलिंग्य, तीसरा भाग बेलनाकार था, जिसे गोद अर्थात अंक में रखकर बजाए जाने के कारण आंकिक नाम मिला। पुष्कर तट पर मिलि प्रेरणा से सर्जित तीन वाद्यों के इस समूह को पुष्करत्रयी या त्रिपुष्कर भी कहा गया । उस युग में चूंकि ऐसे अवनद्ध वाद्य मिट्टी के बनते थे, अतः इन्हे मृदंग कहने की भी प्रथा थी, क्योंकि मिट्टी को मृतिका कहा जाता है। उस काल में मृदंग न तो किसी एक वाद्य को कहा जाता था, और न तो यह पखावज के अर्थ में रुढ हुआ था। तत्कालीन संगीत समाज में मिट्टी के ढाँचे वाले सभी अवनद्ध वाद्यों को मृदंग कहने का प्रचलन था। 'भरत नाट्यशास्र' में पणव, दुर्दर, मुरज, मृदंग और त्रिपुष्कर का पर्यायवाची रुप में प्रयोग हुआ है - कालिदास ने मृदंग और मर्दल को एक ही वाद्य माना है। 'संगीत रत्नाकर' में शारंगदेव ने मुरज तमा मर्दल को मृदंग का पर्याय लिखा है शूद्रक ने 'मृच्छकटिकम्' में पणव के लिए मृदंग शब्द का प्रयोग किया है । ठाकुर जयदेव सिंह के अनुसार मृदंग को पुष्कर भी कहते थे । 'अमरकोष' की क्षीर स्वामी कृत ग्यारहवीं शती की अमरकोषो‌द्घाटन टीका और नारद कृत 'संगीत मकरन्द' अन्य में त्रिपुष्कर के आंकिक, उर्ध्वक व आलिंग्य भावों की आकृतियाँ तथा वादक के सम्मुख रखने की विधि भी बतायी गयी है । वादक के सामने आंकिक बीच में उर्ध्वक दायीं और आलिंग्य बायीं ओर रहता था । अवनद्ध वाद्य जगत् में पुष्कर का आगमन एक क्रान्तिकारी घटना थी। उस समय तक के प्रचलित वाद्यों को अलग-अलग स्वरों में मिलाने की व्यवस्था नहीं थी । उनसे एक ही गूँज और ध्वनि निकलती थी। किसी पशु की पूँछ अथवा लकडी के प्रहारउन्हें बजाने के कारण उनमें अलग-अलग वर्णों का वादन सम्भव नहीं था । जबकि, पुष्कर मैं सर्वप्रथम नदी किनारे की श्यामा मिट्टी का लेपन करके उसकी गूँज को कम और अधिक करने की व्यवस्था की गयी । पुष्कर से आरम्भ हुए मृत्तिका लेपन के इस गुण को विभिन्न अवनद्ध वाद्यों ने कालान्तर में स्याही के रूप में अपनाया। स्वरों को आवश्यकतानुसार ऊँचा और नीचा करने की व्यवस्था भी सर्वप्रथम पुष्कर में हुई थी ।


                  हाथ की उँगलियों से वादन किया जाना पुष्कर की एक और बडी विशेषता थी जिससे इसमें वादन की सम्भावनाओं और इसमे बजने वाले वर्णों की संख्या का विकास हुआ। भरत के अनुसार लगभग 100 अवनद्ध वाद्यों में से मात्र त्रिपुष्कर में ही स्वर, प्रहार, अक्षर व मार्जना संयोजन की व्यवस्था थी। इसीलिए भरत ने अवनद्ध वाद्यों में त्रिपुष्कर को ही मुख्य वाद्य और अन्य अवनद्ध वाद्यों को गौण वाद्यों की श्रेणी में रखा । 4 मुखों और 3 भागों में विभक्त यह वाद्य अपने निर्माण काल और उसके काफी समय बाद लोकप्रियता की चरम सीमा पर था। किन्तु मिट्टी से निर्मित होने और अपने विशाल आकार के कारण आवागमन में कठिनाई से धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता कम होती गयी, और शारंगदेव के समय तक यह लगभग अनुपयोगी हो गया । डॉ. लालमणि मिश्र ने अपने ग्रन्थ 'भारतीय संगीत वाद्य' में लिखा है कि, 7 वीं शताब्दी के बाद शनैः शनै: त्रिपुष्कर कि इस आकृति में परिवर्तन होता गया। उससे उर्ध्वक और आलिंग्य हिस्से हट गए और आंकिक, जो कि अंक में रखकर बजाया जाता या वही भाग बच गया। यह आगे चलकर मृदंग या मुरज के नाम से प्रचलित हुआ। अतः आजकल हम जिस वाद्य को उत्तर भारत में मृदंग या पखावज नाम और दक्षिण भारत बारे में मृदंगम नाम से सम्बोधित करते हैं, वह भरतकालीन मृदंग का केवल एक भाग ही है।


मृदंग या पखावज - मृदंग का आविष्कार वैदिक काल के बाद हुआ, क्योंकि वैदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख नहीं हैं। पुराणों, रामायण और महाभारत में भी मृदंग का नामोल्लेख हुआ हैं। मानवी शताब्दी के बाद पुष्कर की आकृति में परिवर्तन होने लगा। इसका ढांचा लकड़ी और लोहे का बनने लगा। बारहवीं शताब्दी तक इसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया। इसके उर्ध्वक और आलिंग्य हिस्से अलग हो गये और आंकिक ही प्रचार में रह गया । बाद में यह वाद्य मृदंग नाम से रुद हुआ। अतः आज हम जिस वाद्य को मृदंग, पखावज और गृदंगम कहते हैं, वह प्राचीन मृदंग का सिर्फ एक भाग है ।


                  मृदंग का पखावज यह नामकरण मुगल काल में हुआ है। मृदंग या पखावज शास्त्रीय नाम है। तो पखावाज यह जनसामान्य लोगों का शब्द है । इस मृदंग या पखवाज वाद्य को कुछ पुराने लोग पक्ष वाद्य भी कहते है। दक्षिण भारत में प्रचलित मृदंगम् और मृदंग के आकार में थोडी भिन्नता मिलती है । मृदंग अथवा पखावज के दाहिने मुख पर स्याही और बायें मुख पर गेहूँ के गीले आटे का लेपन किया जाता हैं, इसी प्रकार मृदंगम् मे भी दाहिने मुख पर स्याही एवं बायें मुख पर गेहूँ के सुजी के गीले आटे का लेपन किया जाता हैं। मृदंग एवम् मृदंगम् के वादन शैली और हाथों के रख रखावट में भी थोडी बहुत भिन्नता होती हैं। नये जमाने में कुछ मृदंग ऐसे भी दिख रहे हैं, जिनमें बद्धी और गट्टे की जगह नट-बोल्ट लगे हैं तो मुख पर पशु चर्म की जगह फाइबर । शायद बदलते समय के साथ इसमें और भी बदलाव आये...। इस आधार पर यह कहा जा सकता हैं की वर्तमान तबला और पखावज प्राचीन पुष्कर के ही आधुनिक और परिष्कृत रुप हैं, जो बदलते समय और बदलते संगीत के कारण आज इस रुप में स्थापित हैं।


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