राग प्रकरण

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राग-प्रकरण

राग प्रकरण


राग प्रकरण में राग की परिभाषा बताते हुए व्यंकटमखी कहते हैं कि जो मन का रंजन करते हैं वह राग कहलाते हैं। राग के दस लक्षण व्यंकटमखी ने वही स्वीकार किये हैं जो प्राचीनकाल से माने गए हैं, जैसे ग्रह, अंश, न्यास, मन्द्र, तार अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, सन्यास, विन्यास, इनकी व्याख्या भी प्राचीन की भाति ही दी है। इस संदर्भ में व्यंकटमखी कहते हैं कि रागों के उपर्युक्त ग्रह, अंश, न्यास आदि लक्षण शास्त्र में माने गये हैं, परन्तु देशी रागों में यह सभी लक्षण पाये नहीं जाते, सबसे पहले रागों का वर्गीकरण करते हुए उन्होंने अपने ग्रंथ में वर्णित रागों को ग्रह, अंश, न्यास, स्वर की दृष्टि से विभाजित किया है।


      राग प्रकरण में इन्होने राग नाट, सौराष्ट्र, सारंग नाट, शुद्ध बसंतक, गुणक्रिया, नादरामक्रिया, वराली, ललित, सालग, बसंत, आहरी, आभेरी, सामंत, बसंत भैरवी, हेजुज्जी, मालव श्री, शुद्ध रामक्री, कांभोजी, मुखारी, देवगांधारी, नागध्वनि,साम, सामवराली, गुर्जरी, भिन्न षड्ज, रेवगुप्ति, नारायण देशाक्षी, कर्णाट बंगाल, जयंतसेन, मध्यमादि, बहुलि, आंधाली, सावेरी, मलहरि, घंटारव, बेलावलि, भैरवी, गौल, केदारगील, छायागौल, रोतिगौल, पूर्वगौल, नारायणगौल, कन्नड़गौल, सिंहरव इत्यादि रागों को दिया है। अंत में व्यंकटमखी कहते हैं कि ये 55 राग बताये गये हैं, इन सबका वर्णन किया गया है। इन सभी रागों में गुरु तानप्पाचार्य ने गीत, ठाह तथा प्रबंधों की रचना की है। सिंहरव नामक राग की रचना व्यंकटमखी स्वयं के द्वारा बताते हैं। आगे उनका कथन है कि कल्याणो आदि देशी राग में कभी भी गीत, ठाह तथा प्रबन्धों की रचना करना उपर्युक्त नहीं। कल्याणी राग सम्पूर्ण जाति का राग है, उसके आरोह में म नि स्वर वर्जित हैं, अवरोह संपूर्ण है जो हिन्दुस्तानी शुद्ध कल्याण के समान है। यह राग गीतादि रचना के लिए अनुपयुक्त होने पर भी उत्तर भारत की मुसलमान जनता में प्रसिद्ध है। (तुरुष्कामतिप्रिय) इसी प्रकार दूसरा राग पंतुवराली है जो हिन्दुस्तानी तोड़ी के समान है। यह राग साधारण जनता में पावन प्रिय है। विभिन्न प्रादेशिक अंचलों में ऐसे बहुत राग प्रचलित हैं, परंतु उन सबका रूप मिश्रित होने के कारण हमने उनकी अलग से चर्चा नहीं की है।


राग प्रकरण के संदर्भ में विशेष बातें इस प्रकार हैं- 


(1) संपूर्ण रागों को इन्होंने ग्रह, अंश, न्यास की दृष्टि से विभाजित किया है, जैसे षड्ज ग्रह, अंश, न्यास स्वर वाले राग। फिर ऋषभ ग्रह, अंश, न्यास वाले राग इसी प्रकार सप्त स्वरों में ग्रह, अंश, न्यास की दृष्टि से विभाजन किया है।


(2) उन्होंने प्रत्येक रागों के वादी, संवादी, बिवादी और अनुवादी स्वर का उल्लेख किया है। परन्तु इन शब्दों का अर्थ उत्तर हिन्दुस्तानी संगीत के समान नहीं समझना चाहिए, जैसे- राग में लगने वाले और उसके मेल में भी व्यवहत विशिष्ट स्वरों को विवादी की श्रेणी में माना गया है। इसी प्रकार अनेक रागों में दो संवादी स्वर बताये गये हैं।


(3) राग नाट उनका प्रथम राग है जिस राग का नाम मेल के नाम के समान है, वहाँ मेल का नाम नहीं बताया है।


(4) मेल वर्गीकरण के स्वीकार करने के पश्चात् रागों का वर्णन करते समय रागांग, भाांग, क्रियांग और उपांग इन वर्गों का उल्लेख प्रत्येक राग के वर्णन के साथ किया है।


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