पखावज एवं तबला को स्वर में मिलाने के नियम

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पखावज एवं तबला को स्वर में मिलाने के नियम :


पखवाज अथवा तबला वादन के पूर्व उसे अनुकूल एवं इच्छित स्वर में मिलाना भी आवश्यक हैं। वाद्य को स्वर में मिलाने के लिए यह जरूरी है कि वादक को स्वर का अच्छा ज्ञान हो । अतः सफल पखवाजी अथवा ताबलिक बनने के लिए वादक को स्वरों का आधारभूत ज्ञान होना आवश्यक हैं। वादक को सर्वप्रथम यह, जानना चाहिये की मुख्य कलाकार किस राग की प्रस्तुति करने जा रहें है, और उस राग में किन-किन स्वरों का प्रयोग होता है? षडज् (सा) सभी रागों में प्रयुक्त होनेवाला अचल स्वर हैं, और गांभीर्य पसंद कलाकार जब किसी गंभीर राग की प्रस्तुति करते हैं तो चाहते हैं कि वाद्य 'सा' में ही मिले। यदि कुछ कारणवश या मुख्य षडज् स्वर का तबला नहीं है तो सामान्यतः मध्यम अथवा पंचम स्वर में पखवाज या तबला को मिलाया जाता है। जिन रागों में पंचम नहीं है तो उन रागों के लिए मध्यम स्वर में मिलाया जाता है।

तबला जोड़ी के बायें मुख पर स्याही लगायी जाती है तो पखवाज के बायें मुख पर गेहूँ के गिला आटा लगाया जाता है। कुशल वादक दायें के साथ-साथ बायें को भी स्वर में मिलाते है। बायें को मिलाने का एक विशिष्ट नियम यह है कि वह तबले का स्वर षडज् में लगाया जाता है तो डग्गे का मंद्र पंचम स्वर में लगाया जाता है। यदि राग में पंचम स्वर नहीं है तो डग्गे का स्वर मंद्र मध्यम या मंद्र षडज् को लगाया जाता है।


           पखवाज और तबला जैसे साज को मिलाने के लिये गजरा, गट्टा और बद्धी तीनों का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना पड़ता है। आधा अथवा उससे कम स्वर का अंतर होने पर गजरे पर उपर से प्रहार किया जाता है। अगर अंतर लगभग एक स्वर का हो तो गट्टे पर प्रहार किया जाता है। अगर इससे भी अधिक का अंतर हो तो बद्धी को चढ़ाया या उतारा जाता है।गजरे अथवा गट्टे पर ऊपर से प्रहार करने से वाद्य में खिंचाव पैदा होता है... कसावट आती हैं, जिससे स्वर ऊपर की ओर चढ़ता है। जबकि नीचे से ऊपर की ओर प्रहार करने से वाद्य में ढीलापन आने के कारण स्वर ऊपर से नीचे की ओर उतरता है। अतः अगर पखवाज या तबले को थोड़ा सा चढ़ाना हो तो गजरे पर ऊपर से प्रहार करें... लगभग एक स्वर चढ़ाना हो तो गट्टे पर ऊपर से प्रहार करके उसे नीचे की ओर खिसकायें... और अगर उससे भी अधिक चढ़ाना हो तो गट्टे पर बद्धी को चढ़ायें। वाद्य को अगर उतारना हो - स्वर को कम करना हो तो इसकी विपरीत क्रियायें करनी चाहिए । सामान्यतः महिलायें चौथे और पांचवे काले से गाती हैं, जबकि पुरूष पहले और दूसरे काले से। लेकिन, यह कोई सर्वमान्य नियम नहीं है। तंत्र और सुषिर वाद्य भी अपनी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग स्वर में मिलाये जाते हैं। अलग-अलग वादक अपने-अपने वाद्य को अलग-अलग तरीके से मिलाते है । एक तकनीक तो यह हैं की गजरे के सोलह घरों कि बारी-बारी से मिलाते जायें। दूसरी तकनीक यह हैं कि क्रमशः आमने सामने के घरों को एक के बाद एक क्रमशः मिला लें । कुछ वादक अपने वाद्य का स्वर मुख्य कलाकार के स्वर से पहले कुछ कम रखते हैं, फिर धीरे-धीरे जब सारे घर मिल जाते हैं तो हलके प्रहार से उन्हें इच्छित स्वर में मिला लेते हैं।


         हर वाद्य कि अपनी सीमा होती है, अतः उसके स्वरों को चढ़ाने या उतारने की भी अपनी सीमा होती हैं। पहले काले के तबले को पांचवे या दूसरे काले तक तो मिलाया जा सकती हैं, लेकिन उसके स्वरों में इससे अधिक बदलाव करने का उसका स्वाभाविक नाद गुण और सौंदर्य समाप्त हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि छोटे आकार के साज-ऊपर के टीप के स्वरों में अच्छा बोलते हैं, जबकि बड़े आकार के साज नीचे के स्वर में। इसीलिए अधिकांश ताबलिक कार्यक्रमों में जाते समय अलग-अलग स्वरों के दो तबले लेकर जाते हैं, ताकि अलग-अलग स्वरों में गाने-बजाने वाले कलाकारों के साथ कुशलता पूर्वक वादन किया जा सके।


२) पखवाज में आटा लगाने की विधि :   अवनद्ध वाद्यों में प्राचीन काल में नदी किनारे की काली मिट्टी को लगाया जाता था। बाद में पखवाज के रूप में लोकप्रिय होने के बाद पखवाज के बायेंभार पर जौ का आटा लगाया जाने लगा। बाद में गेहूं के आटा का प्रचलन हो गया। पखवाज में लगनेवाला आटा मोटा होना चाहिए, बहुत मद्दीन और बारीक नहीं। इसीलिए चोकरयुक्त आटे का प्रयोग अच्छा माना जाता हैं। चूँकि, आटा पखवाज के बायें मुख पर लगता हैं, और यह नीचे के स्वर में मिलता हैं, इससे गंभीर ध्वनि निकलती हैं, इसीलिए अच्छे किस्म का मोटा आटा बेहतर रहता है।


         आटा कब और कितना लगाया जाये - इसका कोई सर्वमान्य नियम नहीं हैं। यह स्थान और वातावरण पर निर्भर रहता हैं। चूँकि वातानुकूलित सभागारों में वातावरण में नमी होती हैं। पखवाज के खाल में भी नमी होती हैं, इसीलिए कम आटे का प्रयोग करना चाहिए । लेकिन, अगर वातावरण में गर्मी हैं, तो ज्यादा आटा लगाना होगा और उसे अधिक गीला भी नहीं करना चाहिए। खाल में एक प्रकार का सूखापन होना चाहिए । वादन आरंभ करने के लगभग दस मिनट पहले आटा लगा लेना चाहिए, ताकि वह अपना निश्चित प्रभाव बना सके। वादन के तुरंत पहले आटा लगाने से उसमें नमी से दायां और बायां दोनों के स्वर में अंतर आने लगता हैं। इसीलिए कुछ देर पहले आटा लगा लेना अच्छा नहीं होता ।


        पखवाज पर आटा लगाने की भी तकनीक होती हैं। मात्र आटा लगा देना ही पर्याप्त नहीं होता। सबसे पहले गीले आटे को गोल करके पखवाज की बायी पूडी पर लगा देते हैं। फिर अंगुलियों के दबाव से उसे चारों ओर से गंघते हैं कुछ देर तक। कुछ देर तक ऐसा करने से उसमें से लेस निकलने लगता है। जब लेस निकलने लगे तो उसे अंगूठे से दबाकर पूरे पूडी पर फैला देते हैं। दक्षिण भारतीय अवनद्ध वाद्य मृदंगम् के बायें भाग में सूजी लगाया जाता है। चूंकि वहां के बायें की नाद अपेक्षाकृत कम होती है। इसीलिए उनके लिए सूजी पर्याप्त हैं, किंतु उत्तर भारतीय पखवाज पर सूजी लगाने से वह नादात्मक ध्वनि नहीं मिलती, जिसकी कामना होती हैं।




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