भारतीय संगीत में ताल और रूप विधान

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भारतीय संगीत में ताल और रूप विधान 

चौथा अध्याय - यह छंदाध्याय है। यह भी चार परिच्छेदों में विभक्त है।


परिच्छेद क में छन्द का सामान्य परिचय और गद्य, पद्य, ताल, वाद्य और संगीत से उसका सम्बन्ध बताया गया है। इसके बाद वाक् और काल तत्व, सत्, चित् की धारणा से संगीत का संबंध बताया है फिर काव्य और संगीत का संबन्ध बताया गया है। तदोपरान्त 'पद' का विश्लेषण, छन्द और पद्य, वाद्य में छन्द, गान और छन्द, ताल और संगीत का संबंध बताकर छन्द की परिभाषा को बताया गया है। परिच्छेद ख-इसमें छन्द की शास्त्रीय शब्दावली कापरिचय दिया है। इसके अन्तर्गत छन्द की व्युत्पत्ति, भरत की छन्दोगत विधि, पाद, स्थान, अक्षर, वर्ण, स्वर, विधि, वृत्त, भरतोत्तरकालीन छन्द सम्बन्धी पारिभाषिक शब्द-संस्कृत वृत्त सम्बन्धी शब्द बताकर मात्रा, यति, विराम, मात्रिकगण, हिन्दी छन्द सम्बन्धी विशेष शब्द-चरण, विश्रान्ति, तुक, ध्रुव अथवा टेक, पद, छन्द सम्बन्धी कुछ फुटकर नियम, यति नियम, तुक योजना का वर्णन किया गया है।


परिच्छेद ग- इस परिच्छेद में छन्द के उद्भव और विकास क्रम का परिचय दिया गया है। इसमें वैदिक छन्द, संस्कृत वृत्त परम्परा, प्राकृत परम्परा, अपभ्रंश परम्परा, डिंगल परम्परा, हिन्दी छन्द परम्परा के कुछ छन्द, घनाक्षरी, सवैया, ध्रुवपद, पद, आधुनिक हिन्दी काव्य की छान्दसिक प्रवृत्ति इत्यादि का वर्णन करके उपसंहार दिया गया है।


परिच्छेद घ- इसमें विशेष छन्दों का विशेष तालों से सम्बन्ध दिखाया है। इस परिच्छेद में वृत्त और तालों में समानताएं, कर्षण और उसका छंद व ताल से संबंध बताकर ताल में छंद का स्वरूप और ताल की रचना और विशिष्ट छन्द आदि बताकर विभिन्न बोलों में छन्द का स्वरूप इत्यादि का वर्णन किया गया है।


पांचवां अध्याय - यह अध्याय ध्रुवा से सम्बन्धित है। इसमें ध्रुवा की सामान्य चर्चा की गयी है और गांधर्व यान का भेद, ध्रुवा का महत्व, ध्रुवा का स्वरूप, ध्रुवा और गीतक के अंग, पञ्चविध ध्रुवाओं का स्वरूप - प्रावेशिकी, आक्षेपिकी, प्रासादिकी, अन्तरा, पञ्चविध ध्रुवाओं के भेद-शीर्षक। उद्धत, अनुबद्धा, बिलम्बिता, अङ्किता, अवकृष्टा, द्रुता, पाठ्य तथा गेय वृत्तों का भेद, पूर्वरंग में प्रयुक्त ध्रुवाएं, भरतभाष्य के वृत्त, दशविध निर्णीत, आश्रावणा, परिघट्टना, मार्गासारिता, लीलाकृत, परिवर्तनी धुवा, शुष्कावकृष्टा ध्रुवा और ध्रुवा संबंधी फुटकर तथ्य देकर उपसंहार भी दिया गया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ पांच विस्तृत विषयों को समेटे हुए एक प्रमाणिक ग्रन्थ है जो ताल, गीतक, प्रबन्ध, छंद और ध्रुवा पर प्रकाश डालता है।


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