तानसेन जीवन परीचय

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तानसेन जीवन परीचय

 तानसेन जीवन परीचय


                    निःसन्देह, संगीत शब्द से जिन व्यक्तियों को थोड़ा भी प्रेम होगा वे तानसेन के नाम से भी भली भांति परिचित होंगे। यद्यपि इस महापुरुष की मृत्यु को हुए लगभग चार सौ वर्ष हो चुके फिर भी संगीत संसार में इसकी विमल कीर्ति आकाश के सूर्य के समान प्रदीप्त हो रही है। आज हम नीचे लिखी पंक्तियों में इस महान् संगीतकार की जीवनी का संक्षिप्त परिचय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं:-


                      सन् १५००  के लगभग की बात है, ग्वालियर में मुकन्दराम पाण्डे नामक ब्राह्मण निवास करते थे, कोई-कोई इन्हें मकरन्द पांडे के नाम से भी पुकारता था । पांडित्य और संगीत विद्या में लोकप्रिय होने के साथ-साथ इनको धन-धान्य भी यथेष्ट रूप में प्राप्त था। यदि कोई चिन्ता थी तो सन्तान हीन होने की, इनकी पत्नी भी पूर्ण साध्वी एवं कर्मनिष्ठा थीं। दम्पति को संतान की चिन्ता हर समय व्यय बनाये रहती। आखिरकार वह समय भी आ गया, जबकि इनकी चिन्ता एक दिन हमेशा के लिये समाप्त हो गईं। मुहम्मद गौस नामक एक सिद्ध फकीर के आशीर्वाद से सन् १५३२  में, ग्वालियर से सात मील दूर एक छोटे से गांव "बेहट" में, इन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। बालक का नाम 'तन्ना' रखा गया। बच्चे का पालन पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ एक मात्र संतान होने के कारण मां-बाप ने किसी प्रकार का कठोर नियंत्रण भी नहीं रखा फल स्वरूप दस वर्ष की 'अवस्था तक बालक 'तन्ना' स्वतंत्र, सैलानी एवं नटखट प्रकृति का होगया । इस बीच इसके अन्दर एक आश्चर्यजनक प्रतिभा देखी गई; वह थी आवाजों की हूबहू नकल करना। किसी भी पशु-पक्षी की आवाज की असल कापी कर लेना इसका खेल था। शेर की बोली बोलकर अपने बारा की रखवाली करने में इसे बड़ा मजा आया करता था। एक दिन वृन्दावन के महान् संगीतकार सन्यासी स्वामी हरिदास जी अपनी शिष्य मण्डली के साथ-साथ उक्त वारा में होकर गुजरे तो बालक 'तन्ना' ने एक पेड़ की आड़ में छुपकर शेर की दहाड़ लगाई। डर के मारे सब लोगों के दम फूल गये। स्वामी जो को उस स्थान पर शेर रहने का विश्वास नहीं हुआ और तुरन्त खोज की दहाड़ता हुआ बालक मिल गया। बालक के इस कौतुक पर स्वामी जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने जब अन्य पशु- पक्षियों की आवाज भी बालक से सुनी तो मुग्ध हो गये और उसके पिता जी से बालक को संगीत शिक्षा देने के निमित्त मांगकर अपने साथ ही वृन्दावन ले आये । गुरु कृपा से १० वर्ष की अवधि में ही बालक तन्ना धुरंधर गायक बन गया और यहीं इसका नाम 'तन्ना' की बजाय 'तानसेन' हो गया। गुरुजी का आशीर्वाद पाकर तानसेन ग्वालियर लौट आये। इसी समय इनके पिता जी की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व पिता ने तानसेन को उपदेश दिया कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद गौस नामक फकीर की कृपा से हुआ है, इसलिये तुम्हारे शरीर पर पूर्ण अधिकार उसी फकीर का है। अपनी जिन्दगी में उस फकीर की आज्ञा की कभी अवहेलना मत करना। पिता का उपदेश मानकर तानसेन मौहम्मद गौस फक़ीर के पास आ गये। फकीर साहब ने तानसेन को अपना उत्तराधिकारी बनाकर अपना अतुल वैभव आदि सब कुछ उन्हें सौंप दिया और अब तानसेन ग्वालियर में ही रहने लगे।

                थोडे दिनो बाद राजा मानसिंह की पत्नी रानी 'मृगनयनी' से तानसेन का परिचय हुआ। रानी मृगनयनी भी बड़ी मधुर एव विदुषी गायिका थीं, यह तानमेन का गायन सुनकर बहुत प्रभावित हुई। उन्होंने अपने मन्दिर में शिक्षा पाने वाली हुसेनी ब्राह्मणी नामक एक सुमबुर गायिका लडकी के साथ तानसेन का विवाह कर दिया। विवाह के पश्चात् तानसेन पुन: अपने गुरुजी के आश्रम वृन्दावन में शिक्षा प्राप्त करने पहुंचे। इसी समय फकीर मोहम्मद गौस का अन्तिम समय निकट आ गया। फल- स्वरूप गुरुजी के आदेश पर तानसेन को तुरन्त ग्वालियर आना पड़ा। फकीर की मृत्यु हो गई और अब तानसेन एक विशाल सम्पत्ति के अधिकारी बन गये। अब ग्वालियर में रहकर आनन्दपूर्वक गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगे। इनके चार पुत्र और पुत्री का जन्म हुआ। पुत्र का नाम-सुरतमेन, तरइमेन, शरतसेन और पास या तथा लड़की का नाम सरस्वती रखा गया। तानसेन के सभी बच्चे उत्कृष्ट कलाकार हुए। 


                संगीत साधना पूर्ण होने के बाद प्रथम तानसेन को नरेश रामचन्द्र ( राजाराम ) अपने दरबार में ले गये। इन्हीं दिनो तानसेन का सौभाग्य सूर्य चमक उठा। सन् १७७६ ई में तानसेन दिल्ली आ गये। बादशाह ऐसे अमुल्य रत्न को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और तानसेन को उसने अपने नवरत्ना में शामिल कर लिया। बादशाह के अटूट स्नेह और कला का यथेष्ट सम्मान का पाकर तानसेन की यश पताका उन्मुक्त होकर लहराने लगी। अकबर तानसेन की संगीत माधुरी मे डूब गया। बादशाह का तानसेन के प्रती प्यार देखकर दूसरे दरबारी गायक जलने लगे। और एक दिन उन्होंने तानसेन के विनाश की योजना बना ही डाली। यह सब लोग बादशाह के पास पहुच कर कहने लगे कि हुजूर हमें तानसेन से 'दीपक राग' सुनवाया जाय और आप भी सुनें। इस राग को ठीक-ठीक तानसेन के अलावा और कोई नहीं गा सकता । बादशाह राजी हो गये। तानसेन द्वारा इस राग का अनिष्टकारक परिणाम बताये जाने ओर लाख मना करने पर भी अकबर की राजहट नहीं टली और उसे दीपक राग गाना ही पड़ा। राग जैम ही शुरू हुआ गर्मी बढी ओर धीरे-धीरे वायुमण्डल अग्निमय हो गया। सुनने वाले अपने-अपने प्राण बचाने को इधर-इधर छुप गये, किन्तु तानसेन का शरीर अग्नि की लपटों मे जल उठा। उसी समय तानसेन अपने घर भागे यहा उनकी लड़की तथा एक गुरु भगिनी ने मेराग गाकर उनके जीवन की रक्षा की। उस घटना के कई मास पश्चात् तानसेन का शरीर स्वस्थ हुआ। अकबर भी अपनी गलती पर बहुत पछताया। तानसेन के जीवन में पानी बरसाने, जंगली पशुओं को बुलाने, रोगियों को ठीक करने आदि की अनेक चमत्कारपूर्ण घटनायें हुई। यह निर्विवाद सत्य है कि गुरु कृपा से उसे बहुत से राग रागनिया सिद्ध थे और उस समय देश में तानसेन जैसा दूसरा कोई संगीतज्ञ नहीं था। तानसेन ने व्यक्तिगत रूप में कई रागों का निर्माण भी किया, जिनमें मिया मल्हार आदि उल्लेखनीय है। इस प्रकार अमर संगीत की सुखद त्रिवेणी बहाता हुआ यह महान् संगीतज्ञ मृत्यु के नेकट आ पहुँचा। दिल्ली में ही तानसेन ज्वर से पीड़ित हुए; अन्तिम समय जानकर उन्होंने ग्वालियर जाने की इच्छा प्रकट की, परन्तु बादशाह के मोह और स्नेह के कारण तानसेन फरवरी सन् १५८५  में दिल्ली में ही स्वर्गवासी हुए। इच्छानुसार तानसेन का राव ग्वालियर पहुँचा कर फकीर मोहम्मद के बराबर समाधी बनादी गई। तानसेन की मृत्यु के पश्चात् उनका कनिष्ठ पुत्र विलास खां, तानसेन के संगीत को जीवित रखने और उसकी कीर्ति को प्रसारित करने में समर्थ हुआ।



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