राग वर्गीकरण भाग-1

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राग वर्गीकरण


 राग वर्गीकरण 

( भाग एक )

रंजयते इति रागः।

अर्थात मनोरंजन एवं रस उत्पन्न करने वाले विशेष नियमावली से प्रेरित स्वरसमुदायको राग कहते हैं।

संगीत एक परिवर्तनशील कला होने के कारण समय के प्रवाह के साथ रागोंका बाह्य रूप भी बदलता रहा है। राग शब्द का पहला उल्लेख छठी (6वी) शताब्दी में हृषी मतंग के ग्रन्थ बृहद्देशी में मिलता है। इस से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय संगीत का अविष्कार रागाचरण से ही प्रारंभ हो चूका है और राग संकल्पना प्राचीन काल से ही चली आ रही है। प्रतिभाशाली संगीत विद्वानोंकी रचनात्मकता, बौद्धिक क्षमता और बदलती सामाजिक रूचि के कारन रागसंगीत विकसित हो चूका है। संगीत तज्ञोंसे नए रागों की निर्मिति होनेसे रागोंकी संख्या बढ़ने लगी। रागोंको व्यवस्थित रूप में करने के लिए राग वर्गीकरण की आवश्यकता महसूस होने लगी। राग वर्गीकरणः रागोंके कुछ समान गुणोंको ध्यान में रखते हुए उनको विभिन्न वर्गों में या समूह में वर्गीकृत किया जाता है। राग वर्गीकरण का अर्थ यह है कि रागोंको निश्चित गट या समूह में बाँधना। विशिष्ट समप्रकृतिक राग या उनसे मिलते जुलते रागोंको वर्गीकृत करना यह राग वर्गीकरण का प्रमुख सूत्र है। अनेक विद्वानोंने कालानुरूप रागोंका विभिन्न ढंग से वर्गीकरण किया। राग वर्गीकरण पद्धति अध्ययन करते हुए प्राचीन काल से आधुनिक काल तक विचार होना जरूरी है। इन वर्गीकरण के अंतर्गत निम्न वर्गीकरण प्रमुख है:


(1) प्राचीन काल (6 वी सदी से 12 वी सदी तक )

(2) मध्य काल (13 वी सदी से 16वी सदी तक ) 

(3) आधुनिक काल (18वी सदी से आजतक )


(1) प्राचीन काल (6वी सदी से 12 वी सदी तक )


गीतियोंका वर्गीकरण: 6 वी शताब्दी में मतंग हृषी प्रणीत बृहद्देशी ग्रन्थ में 7 गीतियों के (शैली) का वर्णन मिलता है। इनमे से शुद्धा, भिन्ना, गौड़ी, बेसरा तथा साधारणी, भाषा, विभाषा इन 7 गीतियों का उल्लेख किया है। इनमे से पहले 5 (पांच) गीतियों के लिए ग्राम राग और शेष दो (भाषा, विभाषा) गीतियों के लिए देशी राग में लिया गया है। ग्राम राग यह जाती या रागों जैसी स्वरसमूह होती थी। ग्राम रागोंको पुरुष राग तथा देशी रागोंको स्त्री राग मन जाता था । की सुन्दर गेय रचना समय के आधार पर राग वर्गीकरणः 7वी शताब्दी में पं. नारद द्वारा रचित 'संगीत मकरंद' में समय के आधार पर राग वर्गीकरण का उल्लेख मिलता है। पं. नारद ने समय के आधार पर रागोंको 3 भागों में बाँटा था। सूर्याश रागः प्रातः काल में गाए, बजाए जाते हैं। मध्यान्ह रागः दिन के समय में गाए, बजाए जाते हैं। चन्द्रांश राग रात के समय में गाए, बजाए जाते हैं। इस परंपरा के अनुसार आगे चलकर कुछ परिवर्तन हुए। आज इस परंपरा का रूप पूर्वांगवादी राग (दिन के 12 बजे से रात के 12 बजे तक और उत्तरांगवादी राग ( रात के 12 बजे से दिन के 12 बजे तक)। संगीतरस के अनुसार राग वर्गीकरणः पं. नारद लिखित 'संगीत मकरंद' में संगीतरस के अनुसार रागोंका वर्गीकरण मिलता है। आनंद, दुख, श्रृंगार, वीर, हास्य, करुण, भयानक जैसे मानवी भावनाओं के रस, स्वर से जुड़कर भिन्न भिन्न राग रसोप्ती निर्माण होने का उल्लेख मिलता है। 'म-प' हास्य और श्रृंगार रस प्रधान 'सारे' वीर, रौद्र, अद्भुत रस प्रधान 'ग नी' करुण रसप्रधान 'ध' : भयानक रसप्रधान स्वर माने गए है।  भिन्न रस के स्वरों का गट / समूह बनाकर राग वर्गीकरण किया गया। प्राचीन काल में जाती गायन प्रचलित था। जाती गायन पद्धति में विद्वानों में कई मतमतान्तर थे। प्राचीन काल का इस राग वर्गीकरण प्रणाली का आधार लेते हुए पं. शारंगदेव ने अपने 'संगीत रत्नाकर' ग्रन्थ में आमूलाग्र परिवर्तन किये। राग वर्गीकरण पद्धति का यह मध्यकाल माना जाता है।



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