भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त वाद्यों का विवरण

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भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त वाद्यों का विवरण

 

भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त वाद्यों का विवरण

(तानपुरा, मृदंगम, पखावज) 


          भारतीय संगीत यह शास्त्रीय संगीत, रविंद्र संगीत, लोकसंगीत जैसे विविधताओं से परिपूर्ण है। यही विविधता संगीत के प्रस्तुतिकरण, वाद्यप्रयोग, गीतों की भाषाओं से भी प्रतित होती है। इनमें से कुछ प्रमुख संगीत विधा और उसके अंतर्गत आनेवाले वाद्यों का विवरण प्रस्तुत लेख (blog)में किया गया है । शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त होनेवाले वाद्य हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वाद्यों का प्रयोग दो रूप में किया जाता है। पहला स्वतंत्र वादन तथा दुसरा साथसंगत के लिए। कुछ वाद्य दोनो भूमिका में भी आते है। इसमें तालवाद्य के रूप में तबला, पखावज तथा सुरवाद्य के लिये हार्मोनियम, सारंगी, व्हायोलिन जैसे वाद्यों का प्रयोग होता है। संगीत सभा में प्रयोग किये जानेवाले वाद्यों में तानपुरा यह प्रमुख वाद्य है, जो गायन और वादन की समारोह में सामायिक है। तानपुरा और हार्मोनिअम विषयक और जानकारी आगे स्पष्ट की है ।


        १. तानपुरा संगीत समारोह में कानोंपर सबसे पहले पडनेवाला सुर तानपुरे का होता है। कलाकार और श्रोताओं को सुरों के समान धागों में पिरोने का काम तानपुरे से अखंड निर्माण होनेवाले नाद करते है। तानपुरे का प्रचलन सोलावी शताब्दी ते मध्य से प्रारम्भ हो । चुका था। प्राचीन समय में तुम्बवीणा या तुम्बीवीणा को तानपुरे का आधार माना जाता है। कुछ विद्वान तानपुरे का आधार 'अलबू' नामक त्रितन्त्री वीणा मानते है। कुछ विद्वानों के अनुसार प्राचीन वीणाओं का परिवर्तित रुप ही आधुनिक युग में तानपुरा के स्वरूप में प्रचलित हुआ है । उत्तर भारत में तुम्बा दाण्ड से जोड़ा जाता है किन्तु दक्षिण का तम्बुरा एक ही लकडी का होता है । उत्तर भारत में यह तुन की लकड़ी और लौकी के तुम्ब का बनाते हैं। तुम्बा और दाण्ड दोनों अन्दर से पोले रखे जाते है । दण्ड, तबली अथवा गुलु, खुटियाँ, तारगहन, पच्चीसा, घुड़च, तारमिलान, जवारी, तार यह तानपुरे के प्रमुख अंग है। महिलायें और पुरुषों के तानपुरे में आकार और तारों के नम्बर का फरक होता है। अलग-अलग धातू से बनी चार तारों को प सा सा सा या म अथवा नि सा सा सा इन स्वरों में मिलाया जाता है। इसके चारों तारों द्वारा उत्पन्न अनुगूँज में (सहाय्यक नाद) सप्तक के सभी स्वर समाए रहते हैं।


         २. पखावज - उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का अत्यन्त प्रतिष्ठित अवनध्द वाद्य पखावज वस्तुतः प्राचीन त्रिपुष्कर वाघ के एक भाग आंकिक का ही परिवर्तित रूप है। उस काल में अंक- अर्थात गोद में रखकर बजाये जाने के कारण यह आंकिक कहलाया, बाद में मिट्टी अर्थात मृतिका से निर्मित होने के कारण मृदंग कहलाया और फिर मुजा अर्थात पख के जोर से बजने के कारण पखावज नाम से जनप्रिय हुआ। अपने आरंभिक उचरण में मिट्टी से बनने वाला मृदंग बाद में लोहे और लकड़ी से बनने लगा। विजयसाल, रक्तचंदन और कटहल आदि की लकड़ी से पखावज का कठरा बनता है। ध्रुपद गायन और वीणा के विभिन्न प्रकारों, खासकर रुद्रवीणा के वादन की संगीत पखावज द्वारा होती है। वैसे पं. रविशंकर, उ. अमजद अली खां, पं. हरिप्रसाद चौरसिया और पं. भजन सोपोरी जैसे वरिष्ठ संगीतकारों ने भी अपने सितार, सरोद, बाँसुरी और संतुर की संगती के लिये पखावज का चयन विभिन्न अवसरों पर किया है। धमार, चारताल, सुलताल और तीव्रा सहित अष्टमंगल, ब्रम्ह, मत्त और लक्ष्मीताल आदि पखावज के प्रमुख ताल है। त्रिपुष्कर के तीन मात्रा से कटकर ९ वी शताब्दी में आंकिक अर्थात आज का पखावज अपने एकल रूप के अस्तित्व के लिये संघर्ष करने लगा था। उस समय इसे गले में लटकाकर बजाया जाता था, और इसे पुरूष के साथ महिलाये भी तब बजाती थीं। १४ वी १५ वी शताब्दी पखावज का स्वर्ण काल था जब ध्रुपद और धमार जैसी गायन शैलियां अपने अस्तित्व को रेखांकित कर रही थी, तबसे १८ वीं शताब्दी तक पखावज की जनप्रियता शीर्ष पर रहीं। रेला, पहाल, परनों के विभिन्न प्रकार, कवित्त और तिहाई आदि का वादन इस पर मुख्य रूप से होता है। कोदऊ सिंह परम्परा, नाथद्वारा परम्परा, नाना पानसे परम्परा, बिहार को दरभंगा और गया आदि घरानों में विभक्त होकर पखावज की विभिन्न वादन शैलियां विकसित हुई हैं। पखावज के मुख्य वर्ण माने जाते हैं ता दीं धुं ना पखावज के बोल खुले और जोरदार होते हैं। इसका ढांचा अंदर से खोखला होता है, और दोनों मुखों पर चमड़े की पूड़ी मदी जाती है। इसका बायां मुख दाहिने मुख से बढ़ा होता है। दाहिने मुख पर तबले की तरह स्वाही-स्थाही रूप से लगी होती है। जबकि, बायें मुख पर गेहूं या जौ का गीला आटा वादन के पूर्व लगाया जाता है, और वादन के पश्चात खुरचकर निकाल दिया जाता है।

          ३. मृदंगम् - दक्षिण भारतीय संगीत के लय वाधों में मृदंगम का प्रमुख स्थान है। यह अति प्राचीन अवनद्ध लय-ताल वाद्य है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब भगवान शंकर ने नटराज के रूप में नर्तन किया तब नंदिकेश्वर ने मृदगम के साथ उनकी संगति की थी। मृदंगम् - यह मृद अंगम् के योग से बना है। मृद और अंगम् काअर्थ है मिट्टी का बना ढाँचा या शरीर जिसका दायाँ भाग छोटा और मध्य भाग ऊँचा है। तमिल भाषा में मृदंगम के दायें और बाये भाग क्रमशः वलनतेर और इडनतैर कहते हैं। मृदंगम के दोनों और ४८ छिद्र होते हैं, और दो-दो डोरियों के बीच सोलह गांठो '' अर्थात बदियों के बीच बंध रहती है। आवश्यकतानुसार ८ गुटकों (गट्टे की सहायता से स्वर परिवर्तित किया जा सकता है। मिटु के काले लेप (स्याही) को कर्ण कहते हैं। बॉयी ओर के चमड़े पर पहले राख को चावल में मिलाकर लगाते थे, परन्तु आजकल राख के स्थानपर सूजी का प्रयोग करते हैं। भरत मुनि ने मृदंगम को सजीव वा बतलाया है। 'मृदंगोमुखले पेन करोतु मधुरः ध्वनिम।' इसके बोल शंकर के हम से निकलने के कारण जीवित है। दायी ओर से बज़नेवाले मुख्य वर्ण दीम घुम किटि तरी नम मुणु और बांयी ओर से निकलनेवाले वर्ण गुम दीम और लोग हैं। इन्हीं के संयोग से विभिन्न प्रकार की रचनायें बनती है। दक्षिण भारत में मृदंगम के दो प्रमुख घराने हैं। पहला घराना तंजाउर है और दुसरा पटुकौटे घराना। वहां शास्त्रीय गायन, वादन और नृत्य की संगति में इसका प्रयोग होता है. तथा कभी-कभी बीच में और कभी अंत में एक छोटा अंश स्वतंत्र वादन जैसा भी होता है। उस समय गायक, वादक अपनी प्रस्तुति रोककर मृदंगम वादक को उसकी प्रस्तुति में सहयोग करते हैं। रामनाद ई श्वरन और पालघाट मणि अय्यर का नाम मृदंगम् वादन के क्षेत्र में काफी आदर से लिया जाता है।




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