भारतीय संगीत की वर्तमान स्थिति: चुनौतियाँ, अवसर और बदलती दिशा
भारतीय संगीत—चाहे वह शास्त्रीय हो, सुगम संगीत हो, या लोकपरंपरा—आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें परंपरा, सर्जनशीलता, और तकनीकी परिवर्तन तीनों मिलकर एक नया संगीत-परिदृश्य तैयार कर रहे हैं। 2025 में भारतीय संगीत की स्थिति को समझने के लिए हमें कई स्तरों पर नज़र डालनी पड़ती है—कलाकार, श्रोते, शिक्षा, बाज़ार, और डिजिटल दुनिया—सब एक-दूसरे को गहरे रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
1. शास्त्रीय संगीत—चुनौतियाँ भी, नई ऊर्जा भी
शास्त्रीय संगीत की लोकप्रियता आज पहले जैसी भले न दिखती हो, लेकिन इसकी सस्टेनेबल ऑडियंस पहले से ज़्यादा मज़बूत हो रही है।
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बड़ी संख्या में युवा अब ऑनलाइन क्लासेस, रियल-टाइम वर्कशॉप्स और फ्यूजन प्रोजेक्ट्स के माध्यम से शास्त्रीय संगीत में रुचि दिखा रहे हैं।
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festivals, baithaks, gharanas—यह सभी अब YouTube और Instagram पर भी जीवंत रूप से दिखते हैं।
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दूसरी तरफ, गंभीर तालीम पाने वाले छात्रों में धैर्य और दीर्घकालीन सीखने की इच्छा पहले की तुलना में कुछ कम दिखती है—जिससे गुरु-शिष्य परंपरा को नई रूपरेखा तलाशनी पड़ रही है।
2. सुगम संगीत—बदलती रुचियाँ और गुणवत्ता की चुनौती
सुगम संगीत या light music आज भी रेडियो, टीवी और सोशल मीडिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लेकिन इसकी वर्तमान स्थिति में कुछ चिंताएँ भी हैं:
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अत्यधिक ऑटो-ट्यून, बीट-हेवी ट्रैक्स, और तुरंत वायरल होने वाली धुनें पारंपरिक मेलोडी को पीछे धकेल रही हैं।
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कई प्रतिभाशाली गायक और संगीतकार जो शास्त्रीय पृष्ठभूमि रखते हैं, उन्हें स्पेस बनाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है।
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हालांकि, एक सकारात्मक बदलाव ये है कि इंडी आर्टिस्ट्स और स्वतंत्र संगीत को पहले कभी न मिले अवसर आज आसानी से उपलब्ध हैं।
3. भारतीय लोकसंगीत—फ्यूजन और ग्लोबल पहचान
राजस्थान का मांड, महराष्ट्र का वारी-परंपरा संगीत, पंजाब का सूफी, असम का बिहू, बंगाल का बैउल और उत्तराखंड का लोक—आज सबको दुनिया भर में सुना जा रहा है।
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कई युवा कलाकार लोकसंगीत को इलेक्ट्रॉनिक, जैज़, या हिप-हॉप के साथ फ्यूज़ कर रहे हैं।
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YouTube और reels ने लोकगायकों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
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सबसे बड़ा खतरा यह है कि कुछ जगहों पर लोकसंगीत अपनी मूल पहचान खोकर अतिआधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहा है।
4. सोशल मीडिया—संगीत को नया बाज़ार
2025 में संगीत की असली दौड़ कहीं मंचों पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जा रही है।
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Reels और Shorts ने “15 सेकंड की संगीत संस्कृति” पैदा की है।
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लोग पूरा गीत कम सुनते हैं, लेकिन कोई छोटा ‘हुक लाइन’ अगर वायरल हो जाए तो कलाकार की किस्मत बदल जाती है।
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सोशल मीडिया ने एक साधक को, एक उभरते कलाकार को, और एक बड़े स्टार को—सबको एक जैसा प्लेटफॉर्म दिया है।
यह लोकतंत्रीकरण (democratization) अच्छा भी है और चुनौतीपूर्ण भी।
अच्छा इसलिए कि प्रतिभा अब कहीं भी चमक सकती है, और कठिन इसलिए कि गुणवत्ता की तुलना में ट्रेंड्स ज्यादा हावी होते दिख रहे हैं।
5. संगीत शिक्षण—परंपरा और डिजिटल दुनिया का संगम
भारतीय संगीत शिक्षा में तेजी से बदलाव आ रहे हैं।
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ऑनलाइन क्लासेस, एआई-आधारित रियाज़ ऐप्स, डिजिटल तानपुरा, स्मार्ट तबला—ये सब सीखने को आसान बना रहे हैं।
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लेकिन शिक्षकों के सामने नई चुनौतियाँ हैं:
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बच्चों का ध्यान पहले की तुलना में कम समय तक टिकता है
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संगीत सीखने की गंभीरता में कमी
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प्रैक्टिस की निरंतरता बनाए रखना सबसे बड़ी समस्या है
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फिर भी, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने संगीत शिक्षा को पहुँच और गति दोनों दी हैं।
6. उद्योग (Industry) का बदलाव—बॉलीवुड से स्वतंत्र यात्रा
कभी संगीत का सबसे बड़ा स्रोत बॉलीवुड था।
आज स्थिति बदल गई है:
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इंडी संगीतकार अपने गाने खुद रिलीज़ कर रहे हैं।
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संगीत कंपनियों की भूमिका कम और क्रिएटर्स की शक्ति अधिक हो रही है।
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लाइव कॉन्सर्ट्स, unplugged shows, intimate venues—इनका चलन काफी बढ़ चुका है।
इस बदलाव ने भारतीय संगीत को कई दिशाओं में फैलने और विकसित होने का मौका दिया है।
7. आध्यात्मिक और भक्तिमय संगीत—स्थिर, लोकप्रिय और बढ़ती आवश्यकता
भजन, अभंग, कीर्तन, नामस्मरण—इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
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तनाव भरे समय में लोग आध्यात्मिक संगीत को अपने जीवन का जरूरी हिस्सा मान रहे हैं।
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वारी-परंपरा, संत वाङ्मय का संगीत, और गुरुभक्ति पर आधारित संगीत की मांग बढ़ रही है।
यही कारण है कि महाराष्ट्र सहित पूरे भारत में भक्तिमय संगीत आज भी सबसे स्थिर और सबसे दीर्घकालिक श्रोताओं वाला क्षेत्र माना जाता है।
समापन: भारतीय संगीत—संकट नहीं, परिवर्तन का युग
भारतीय संगीत की वर्तमान स्थिति को यदि एक शब्द में समझाया जाए, तो वह होगा: परिवर्तन।
यह एक ऐसा दौर है जिसमें—
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परंपरा भी है
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प्रयोग भी है
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व्यावसायिक दबाव भी है
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और डिजिटल स्वतंत्रता भी
संगीत का यह सफर हमें बताता है कि भविष्य उन्हीं का है, जो गुणवत्ता, रियाज़, सृजनशीलता, और डिजिटल समझ—इन चारों को साथ लेकर चलेंगे।

