पखावज और वारकरी संगीत का अद्वितीय संबंध
भूमिका
भारतीय संगीत में ताल और लय का विशेष स्थान है, और जब हम वारकरी संप्रदाय के भजन और कीर्तन की बात करते हैं, तो पखावज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पखावज न केवल कीर्तन का प्रमुख ताल वाद्य है, बल्कि यह वारकरी संप्रदाय की आध्यात्मिक साधना का भी अभिन्न अंग है।
पखावज: एक परिचय
पखावज भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्राचीन ताल वाद्य यंत्र है, जिसे विशेष रूप से ध्रुपद गायन और भक्ति संगीत में उपयोग किया जाता है। इसका निर्माण लकड़ी से होता है और दोनों सिरों पर चमड़े की झिल्ली होती है। यह अपने गंभीर और गूंजदार ध्वनि प्रभाव के लिए प्रसिद्ध है।
वारकरी संप्रदाय और कीर्तन परंपरा
वारकरी संप्रदाय संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, एकनाथ आदि संतों की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला भक्ति आंदोलन है। इस संप्रदाय में कीर्तन का विशेष महत्व है, जिसमें हरिपाठ, अभंग, और ओवी गायन किया जाता है। वारकरी संप्रदाय के अनुसार, संगीत और भजन भगवान से जुड़ने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है।
वारकरी संगीत में पखावज की भूमिका
- ताल का आधार – वारकरी संप्रदाय के कीर्तन और भजन गायन में पखावज ताल का प्रमुख आधार होता है। यह भजन गायन को सही लय और गति प्रदान करता है।
- भावनाओं की अभिव्यक्ति – वारकरी संतों के अभंगों और भजनों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। पखावज की गूंजती हुई ध्वनि इन भावनाओं को और अधिक प्रबल बना देती है।
- सामूहिकता का प्रतीक – वारकरी संप्रदाय में सामूहिक भजन-कीर्तन का विशेष महत्व है, जहां पखावज पूरे समूह को एक ही लय में बांधने का कार्य करता है।
- परंपरा का वाहक – वारकरी संप्रदाय में संगीत और भजन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते हैं, और पखावज इस परंपरा को जीवंत बनाए रखता है।
निष्कर्ष
पखावज और वारकरी संगीत का संबंध केवल वाद्य और गायन का नहीं, बल्कि यह भक्ति, साधना और परंपरा का एक अटूट संगम है। यह न केवल संगीत की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी एक सशक्त माध्यम है। वारकरी संप्रदाय के भक्तों के लिए यह वाद्य यंत्र केवल ताल देने का साधन नहीं, बल्कि भगवान विट्ठल से जुड़ने का एक सजीव माध्यम है।