स्वामी रामशंकर दास - पागलदास

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 स्वामी रामशंकर दास - पागलदास


स्वामी पागलदास के नाम से विख्यात - प्रतिष्ठित पखवाज वादक का वास्तविक नाम रामशंकर दास था । इन्हें बचपन से ही कविताएँ लिखने का शौक था । अतः कवि के रूप में ये अपना एक छद्म उपनाम रखना चाहते थे। इस संदर्भ में उन्होंने अपने गुरू सम अग्रज संत शरण मस्त से आग्रह किया तो उन्होंने विनोदवश इन्हें पागलदास नाम रखने का सुझाव दे दिया । स्वामीजी ने गुरू के मजाक को आज्ञा समझकर शिरोधार्थ किया और संगीत के आकाश में स्वामी पागलदास के नाम से जगमगा उठे । इनका जन्म १५ अगस्त, १९२० को हुआ। इन्होंने सर्वप्रथम बाबू नेपाल सिंह से तबला सीखा, बाद में बाबा भगवान दास से पखवाज । स्वामीजी शुरू में तबला और पखवाज दोनों ही बजाते थे। लेकिन बाद में उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के सुझाव पर इन्होंने स्वयं को पखवाज पर ही केंद्रित कर लिया। स्वामीजी का बचपन अत्यंत संघर्षमय था । इन्होंने चाय की दुकान पर भी काम किया, संगीतकारों के घरो में भी और रामलीला तथा रास लीलाओं में भी। लेकिन, पखवाज की साधना अनवरत जारी रही । स्वामीजी ने संत शरण 'मस्त' से गायन एवं काव्य लेखन का मार्गदर्शन प्राप्त किया था।


              स्वामी पागलदास ने तीन भागों में तबला कौमुदी तथा दो भागों में मृदंग तबला प्रभाकर जैसी पुस्तकें लिखकर संगीतार्थियों का मार्ग प्रशस्त किया था। इन्होंने अयोध्या में हनुमंत विश्वकला आश्रम नामक एक संस्था की भी स्थापना की थी, जहाँ विद्यार्थियो को निःशुल्क संगीत शिक्षा दी जाती थी। स्वामीजी ने विभिन्न प्रकार की हजारों बंदिशों की रचना करके संगीत के भंडार को समृद्ध किया था।स्वामी पागलदास ने कर्कश, कठोर और मारधाड के पर्याय के रूप में प्रचलित पखवाज वादन की कला में मधुरता और सरसता का समावेश कर उसका श्रृंगार किया हैं। मधुर से मधुर और कठोर से कठोर वादन उनकी विशेषता थी। परणों में अगर मेघ का गर्जन-तर्जन दिखता था तो रेलों में बारिश की बौछारें भी । स्वामी पागलदास संन्यासी थे । धार्मिक भावनाओं से ओत प्रोत और अविवाहित स्वामीजी ने भगवान ताल, मोहिनी ताल, पुराण ताल, नक्षत्र ताल, शिवलीला, त्रिलोचन, पंचानन, जानकी और ठाकुर तालो की रचना करके अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया था । अद्भुत प्रतिभा के धनी थे वे स्वामीजी पखवाज के लिए पूरी तरह समर्पित थे। उन्होंने अयोध्या स्थित अपने आश्रम में पचासो लोगों को निःशुल्क रखकर, अपनी ओर से उनके भोजन और आवास की व्यवस्था करके उन्हें पखवाज वादन का उच्चस्तरीय ज्ञान प्रदान किया था। अपने शिष्यों को आगे बढ़ाने के लिए वे हर समय, हर स्तर पर सदा प्रयत्नशील रहते थे । अपने परिचितों में 'पागल बाबा' के नाम से मशहूर स्वामीजी के पचासों शिष्यों में स्व. रामकिशोर दास, डॉ. राज खुशिराम, राजकुमार झा, कौशल द्विवेदी, संजय आग्ले, जगदम्बा प्रसाद, चम्पू महाराज तथा नार्दिन आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन्होंने अपनी वादन शैली को अवधी घराने का नाम देकर प्रचारित किया था। पखवाज की एकनिष्ठ सतत साधना और अप्रतिम प्रचार-प्रसार के लिए स्वामीजी को कई मान-सम्मान मिले थे, जिनमें प्रमुख है - मृदंग केसरी आचार्य, पखवाज के जादूगर, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की सम्मान आदि । वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के सर्वोच्च श्रेणी के कलाकार थे।जीवनपर्यंत पखवाज वादन की कला को विकसित करनेवाले महान पखवाजी मृदंगाचार्य स्वामी पागलदास जी २१ जनवरी, १९९७ को अयोध्या में नाद ब्रह्म में लीन हो गए।


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