संधिप्रकाश राग

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संधिप्रकाश-राग

 संधिप्रकाश राग 


ऊपर बताये हुए ३ वर्गों में से प्रथम वर्ग अर्थात् कोमल और कोमल ध वाले राग सन्धिप्रकाश रागों की श्रेणी में आ जाते है। ध्यान रहे इसवर्ग में रे, ध कोमल के साथ-साथ ग तीव्र होना जरूरी है। क्योंकि ग यदि कोमल होगा तो वह तीसरे वर्ग मे आजायगा । दिन और रात की सन्धि यानी मेल होने के समय को सन्धिकाल कहते हैं। प्रात काल सूर्योदय से कुछ पहले ओर शाम को सूर्यास्त ने कुछ पहिले का समय ऐसा होता है जिसे न तो दिन कह सकते हैं न रात । इसी समय को सन्धिप्रकाश कहा गया है और इस मे जो राग गाये बजाये जाते हैं, उन्हें ही सन्धिप्रकाश राग कहते हैं। जैसे भैरव, कलिंगड़ा, भैरवी, पूर्वी, मारवा इत्यादि । सन्धिप्रकाश के भी २ भाग माने गये हैं।


(१) प्रात कालीन सन्धिप्रकाश राग और (२) सायंकालीन संधीप्रकाश राग । जो राग सूर्योदय के समय गाये बजाये जायेगे ये प्रात कालीन संधीप्रकाश राग होंगे और जो सूर्यान्त के समय गाये जायेगे उन्हें सायंकालीन संधीप्रकाश राग कहेंगे।


संधीप्रकाश रागों में मध्यम स्वर बडे महत्त्व का है। प्रात कालीन संधीप्रकाश रागों में अधिकतर मध्यम कोमल या नी शुद्ध होगा और सायकालीन सन्धिप्रकाश रागों में अधिकतर तीव्र मध्यम मिलेगा। जैसे भैरव और कालिङ्गडा प्रात कालीन संधिप्रकाश राग हैं, क्योंकि इनमे शुद्ध मध्यम है और पूर्वी अथवा मारवा सायकालीन संधिप्रकाश राग हैं, क्योंकि इनमे तीव्र मध्यम है।


संधिप्रकाश रागो की एक साधारण पहचान यह भी है कि उनमे धैवत स्वर चाहे कोमल हो या तीव्र, किन्तु उनमे है कोमल और ग नि तीव्र ही अधिकतर मिलेंगे। यद्यपि कोई कोई संधिप्रकाश राग इस नियम का अपवाद भी हो सकता है, जैसे- भैरवी इत्यादि ।


(२) रे ध शुद्ध वाले राग


रे, ध शुद्ध (तीव्र) वाले रागों के गाने का समय संधिप्रकाश के बाद आता है, क्योंकि संधिप्रकाश काल दिन में २ बार आता है, अब इस वर्ग के रागों के गाने का समय भी २४ घण्टों में २ बार आता है। इसमें कल्याण, बिलावल ओर खमाज थाट के राग गाये बजाये जाते हैं।


प्रात कालीन संधिप्रकाश रागों के बाद गाये जाने वाले रागों मे, दिन चढने के साथ ही साथ शुद्ध रे तथा शुद्ध ध की प्रधानता बढती जाती है। इस प्रकार प्रात ७ बजे से १० बजे तक और शाम को ७ बजे मे १० बजे तक दूसरे वर्ग अर्थात रे ध शुद्ध वाले राग गाये बजाये जाते हैं। इस वर्ग में ग का शुद्ध होना आवश्यक है। साथ ही साथ इस वर्ग के रागों में मध्यम स्वर का भी विशेष महत्व है, वह इस प्रकार कि सवेरे ७ बजे से १० बजे तक गाये जाने वाले रागों में शुद्ध यानी कोमल मध्यम की प्रधानता रहती है, जैसे बिलावल, देसकार, तोडी इत्यादि ओर शाम के ७ बजे मे १० तक गाये जाने वाले रागों में तीव्र मध्यम की प्रधानता रहती है। जैसे यमन, शुद्धकल्याण, भूपाली इत्यादि ।


(३) कोमल ग, नि वाले राग


इस वर्ग के रागों को गाने का समय रे ध शुद्ध वाले रागों के बाद आता है, अर्थात ग नि कोमल वांले राग दिन के १० बजे से ४ बजे तक और रात को १० बजे से ४ बजेतक गाये बजाये जाते हैं। इस वर्ग के रागों की खास पहचान यह है कि उनमें ग कोमल जरूर होगा, चाहे रे-ध शुद्ध हों या कोमल। इस वर्ष के रागो में प्रातःकाल के समय आसावरी, जौनपुरी, गांधारीतोड़ी इत्यादि राग गाये जाते हैं और रात्रि के समय में यमन इत्यादि गाने के बाद जैसे जैसे आधी रात्रि का समय आता जाता है, बागेश्री, जयजयवन्ती, मालकौंस इत्यादि राग गाये बजाये जाते हैं।


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