बांसुरी : संपूर्ण जानकारी

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बांसुरी

बांसुरी : संपूर्ण जानकारी


           यह भारतवर्ष का अति प्राचीन फूक का वाद्य है। भगवान कृष्ण ने  इसे अमरत्व प्रदान कर दिया है। आजकल बासुरी कई प्रकार की मिलती हैं, किन्तु हम यहा पर उसी का विवरण दे रहे हैं, जिसमें ६ सूरास होते हैं और अंग्रेजी ढंग पर उसकी ट्यूनिंग होती है। यद्यपि देशी बासुरी भी काफी प्रचलित हैं, किन्तु उसे बासुरी के कुशल वादक ही पहिचान सकते हैं कि इसकी ट्यून ठीक है या नहीं। बहुत से कलाकार बास की बासुरी अपनेलिए स्वयं बना लेते हैं, किन्तु सभी के लिये, तो ऐसा करना सम्भव नहीं हो सकता, अतः ६ सुराख वाली बांसुरी बजाने की विधि दी जारही है।


बांसुरी में सरगम निकालने की विधि


        सर्व प्रथम बांसुरी के सब सूराखों को इस प्रकार बन्द करिये कि बांये हाथ की पहली दूसरी-तीसरी अँगुलियां ऊपर के ३ सूराखों पर जमाई जांय। फिर दाहिने हाथ की पहली दूसरी-तीसरी अँगुलियों से नीचे के तीनों सूराख बन्दे किये जाय । ध्यान रहे कि सुराखों को अँगुलियों की पोर से अच्छी तरह दबाना चाहिए। यदि बीच में कोई भी उंगुली सूराख से थोड़ी भी हट गई तो आवाज फटी-फटी निकलेगी । सब सूराख उपरोक्त विधि से बन्द करने के बाद मुँह से हलकी फूंक लगाइये, इसमें सब सुराख बन्द होने पर जो स्वर निकलेगा, वह मन्द्र सप्तक क़ा प होगा। बाकी स्वर एक-एक अँगुली क्रमानुसार उठाने पर इस प्रकार निकलेंगेः  


  प सब सुराख बन्द करने पर।


ध- नीचे का १ सूराख खोलने पर ।


नि नीचे के २ सुराख खोलने पर 


सा - नीचे के ३ सुराख खोलने पर


रे - नीचे के ४ सुराख खोलने पर 


ग - नीचे के ५ सुराख खोलने पर


मं - सब सूराख खोल देने पर ।


             इस प्रकार ६ सूराखों से प ध नि सा रे ग म यह सात. स्वर निकले। इनमें मध्यम तीव्र है, बाकी स्वर शुद्ध हैं। मध्यम को शुद्ध बनाने के लिये ऊपर का सिर्फ आधा सुराख दबाना पड़ता है तथा अन्य स्वरों को कोमल बनाने के लिए भी सूराखों का अर्थ प्रयोग किया जाता है।


        इसके आगे के स्वर यानी मध्य सप्तक के प ध नि और तार सप्तक के स्वर निकालने के लिए क्रम बिलकुल यही रहता है, सिर्फ मुँह की फूंक का वजन बढ़ा दिया जाता है। उदाहरणार्थ - सब सूराख बन्द करने पर हलकी फूक से मन्द्र पंचम निकला है तो फूंक का वजन दुगुना कर देने पर मध्य सप्तक का पंचम (प) बन जायगा। इसी प्रकार अन्य स्वर भी फूंक के दबाव के आधार पर आगे की सप्तक के निकलेंगे । बांसुरी पर पहले यमन राग के स्वरों सा रे ग म प ध नि का ही अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि यमन राग में मध्यम तीव्र और बाकी स्वर शुद्ध हैं और बांसुरी में भी पूरे सूराखों के खुलने पर यही स्वर आसानी से निकलते हैं। बाद में अभ्यास होजाने पर आधे-आधे सूराखों के प्रयोग से अन्य विकृत स्वर भी निकलने लगेंगे ।


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