उस्ताद आफाक हुसैन

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उस्ताद-आफाक-हुसैन

उस्ताद आफाक हुसैन


              लखनऊ घराने के सुप्रसिद्ध ताबलिक आफाक हुसैन का जन्म १९३० को लखनऊ में हुआ था। इनके पिता का नाम खलीफा उस्ताद वाजिद हुसैन था, जो महान तबला वादक थे। उस्ताद आफाक हुसैन को तबले की उच्चस्तरीय शिक्षा अपने पिता वाजिद खलीफा से ही मिली थी। तबले पर चांटी और लव के बोलों के सुंदर समन्वय, रसपूर्ण और मधुर वादन तथा बायें की सघन भूमिका के लिए विख्यात रहे उस्ताद आफाक हुसैन गायन, वादन और कथक नृत्य तीनों की संगति के लिए प्रसिद्ध थे । इनके मुक्त तबला वादन का कार्यक्रम भी अत्यंत सफल होता था । आफाक साहब को देश के सभी वरिष्ठ कलाकारों के साथ संगत करने का सुयोग मिला था और इस सुयोग का लाभ उठाते हुए इन्होंने अपनी प्रतिभा सिद्ध की थी। आफाक हुसैन के जीवन का पूर्वार्ध संघर्षमय था। अतः इन्हें अपनी जन्मभूमि लखनऊ को छोड़कर कोलकता जाना पड़ा था। कोलकता में खाँ साहब को पर्याप्त मान-सम्मान मिला । वहाँ उन्होंने कई लोगों को तबला सिखाया भी। बाद में १९७२ में खाँ साहब लखनऊ वापस आ गए। यहाँ उन्होंने उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा संचलित कथक केंद्र में तबला संगतिकार के पद को ग्रहण किया । गुरू लच्छू महाराज नृत्य गुरू थे । नया-नया स्थापित कथक केंद्र उस समय नया आकार ले रहा था, नई ऊँचाई की ओर अग्रसर हो रहा था। और लच्छू महाराज तथा उनकी शिष्याओं के साथ उस्ताद आफाक हुसैन भी उसमें नया रंग भर रहे थे ।


                इसके बाद लखनऊ में जब दूरदर्शन केंद्र की स्थापना हुई तो आफाक हुसैन को वहां विभागीय तबला वादक के रूप में ससम्मान स्थान मिला। आफाक हुसैन ने सैकड़ों लोगों को मुक्त हस्त से तबला वादन की उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान की। इनके एक शिष्य डॉ. जिम कीपेन (इंग्लैंड) ने अंग्रेजी में तबला विषयक एक बहुत ही अच्छी पुस्तक लिखि है जो लखनऊ घराने पर केंद्रित हैं। आफाक साहब के सैकड़ों शिष्य लखनऊ सहित आसाम, बंगाल, श्रीलंका एवं कई दूसरे देशों में फैले हुए हैं। इनके पुत्र इलमास हुसैन और इलियास हुसैन भी अच्छे ताबलिक हैं। इनके प्रमुख शिष्यों में पी.बी. नंदश्री (श्रीलंका) एवं जेराल्ड खुर्जियान (फ्रान्स) सहित भोपाल राय चौधरी, विवेकानंद भट्टाचार्य, प्रबीर कुमार मित्रा, तिमिर राय चौधरी, पंकज चौधरी, पवन बरदोलोई और अरूण तालुकदार के नाम उल्लेखनीय है। आफाक हुसैन ने १९४५ से सार्वजनिक कार्यक्रम देना शुरू किया था। १९६२ में इन्होंने अफगानिस्तान की भी सांगीतिक यात्रा की थी । १९८५ में पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में भी इन्होंने भाग लिया था। फ्रांस स्थित स्टार युनिवर्सिटी में तबला वादन की शिक्षा देने के लिए ये कई बार गये थे। खाँ साहब को उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी सम्मान १९८८ सहित कई अन्य मान-सम्मान भी मिले थे। उनका निधन १४ फरवरी, १९९० को लखनऊ में हुआ।


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