व्याख्या

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आमद -


इस शब्द का अर्थ है आगमन । नृत्य के प्रारंभ में बजाये जाने वाले बोल रचना को आमद कहते हैं। कुछ जानकारों के अनुसार खुद के सम पर आने का अंदाज और सम की पूर्वकल्पना अपने रचना द्वारा देनेवाली बंदिश आमद कहलाती हैं।


तिपल्ली


ति + पल्ली याने तीन पल्ले (भाग), अर्थात जिस रचना में लय के तीन दर्जे दिखाई देते हैं, उसे तिपल्ली कहते हैं। विद्वानों में इस संदर्भ में दो मत (विचार) प्रकट किये जाते हैं। पहले मतानुसार केवल तीन लय दर्शाने वाली रचना को तिपल्ली कहते हैं, तो दुसरे मतानुसार लय के तीन अलग-अलग दर्जे लेकिन तीनों लय में 'धा' से समाप्त होनेवाला बोल समूह एक ही होना चाहिए।


गत कायदा -


'गत' इस प्रकार में अंर्तभूत बोलों की रचनाः जिस समय कायदा जैसे या कायदे के नियमों का पालन कर, उसका विस्तार किया जाता है, ऐसी रचना को गत कायदा कहते हैं। यह रचना प्रकार लखनऊ और फर्रुखाबाद घरानों में अधिक मात्रा में प्रतलित हैं। यह विस्तारक्षम रचना होने पर भी कायदे के समान इसका विस्तार नही होता, क्यों कि रचना होने पर भी कायदे के समान इसका विस्तार नहीं होता, क्यों कि रचना में जिस प्रकार के बोलों का प्रयोग किया जाता है। उसे आसानी से ऊपर की लय (तेज लय) में बजाना संभव नहीं होता है।

 

फरमाईशी चक्रदार 


पुराने समय में जब गुणी संगीतज्ञों की महफिलें जमती थी, जब संगीतज्ञ दूसरे संगीतज्ञों से कुछ विशेष और दुर्लभ बंदिशें सुनाने का आग्रह, फरमाईश करते थे। अतः ऐसी विशेषता युक्त बोलों को फरमाईशी बोल कहा जाता था । इसके अंतर्गत चक्रदार रचनाओं के उन विशेष टुकड़ों, परनों को रखा जाता है, जिन्हें पहली बार बजाने से तिहाई का पहला भाग सम पर समाप्त हो। दूसरी बार बजाने से तिहाई का दूसरा भाग सम पर समाप्त हो और तीसरी बार बजाने से तिहाई का अंतिम भाग सम पर समाप्त हो । इस तरह की रचनाएँ चूंकि अपेक्षाकृत कम मिलती हैं, अतः इन्हे फरमाईशी की श्रेणी में रखा जाता है। फरमाईशी चक्रदार का आशय इन दिनों ऐसी ही रचनाओं से होता हैं। इसके अंतर्गत, टुकड़े और परन जैसी रचनाएँ आती है |


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