महर्षी भरत

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महर्षी-भरत



महर्षी भरत


                महर्षी भरत का काल 500 ई. से भी पहले है। 'भरत नाट्य शास्त्र' इनके सिद्धान्तों का प्रतिपादक ग्रंथ है। इस ग्रंथ पर अनेक विद्वान् आचार्यों ने टीकाएं की हैं। नाट्य के आदिम प्रयोक्ता भरत ब्रह्मा के शिष्य कहे गये हैं। मत्स्य पुराण में भी इनकी चर्चा मिलती है। डॉ. मनमोहन घोष भरत को काल्पनिक व्यक्तित्व मानते थे, परन्तु कुलगुरु कालिदास के द्वारा इन्हें नाट्य का आदिम प्रयोक्ता माना गया है। बाण ने 'भरत' का स्मरण नृत्यशास्त्र के प्रणेताओं में किया है।

            महर्षी भरत ने चित्रा और विपंची नामक दो तंत्री वाद्यों को चर्चा अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में की है। चित्रा में सात तार होते थे, जो क्रमशः सातों स्वरों में मिलाए जाते थे। महर्षि भरत को वीणा मत्तकोकिला कही जाती है, जिसमें इक्कीस तारों पर तीनों सप्तक मिले रहते थे। भरतकाल की वीणा में सारिकाएं (परदे) नहीं होती थीं। प्रत्येक स्वर के लिए अलग अलग तार होता था।दत्तिल, कोहल, मतंग, अभिनवगुप्त, हरिपाल, शारंगदेव एवं कुम्भा जैसे लेखक प्रधानतः भरत-मतानुयायी ही थे। नाटक के सभी अंगों पर नाट्यशास्त्र में विचार किया गया है। भरत-प्रतिपादित श्रुति-सिद्धान्त के आधार पर स्थित जातियों में समस्त लोक का संगीत निहित है। भरत के सिद्धांत सार्वभौमिक एवं सार्वदेशिक हैं। जातियों के निरूपण के अतिरिक्त भरत ने शुद्ध ग्राम रागों का नाम लेकर नाट्य में उनके प्रयोग के अवसर बताए हैं। जाति-अवस्था के राग-अवस्था में बदल जाने के कुछ कारणों पर 'भरतनाट्यशास्त्र' में विचार किया गया है। महर्षि भरत ने अपने सौ पुत्रों को नाट्य वेद की शिक्षा दी। नाट्य के जिस अंग-विशेष में जिसे रुचि थी, वह उसमें पारंगत हुआ।

              कनिष्क काल के उपरांत ही भरत ने संगीत का प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र लिखा। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का काल कुछ विद्वान् 200 ई.पू. से 400 ई. के मध्य में मानते हैं। विद्वानों की मान्यता नुसार 'भरत' शब्द का अर्थ 'अभिनय करने वाले से है। इसीलिए' भरत' नाम नाट्य के शास्त्रकारों के साथ जुड़ा हुआ है, ऐसा भी माना जा सकता है। इस आधार पर कुछ विद्वानों का कथन है कि यह ग्रंथ किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं है। कुछ भी हो आज नाट्यशास्त्र के तीन संस्करण (बम्बई, बड़ौदा और बनारस के) प्राप्त होते हैं। इनमें पाठभेद तथा अध्यायों एवं श्लोकों की संख्या और क्रमभेद से यह स्पष्ट होता है कि इस ग्रंथ में काफी परिवर्तन होते रहे होंगे। परन्तु फिर भी अधिक विद्वान् इसी पक्ष में हैं कि यह एक ही व्यक्ति की रचना है।



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