संगीत की शक्ति

0
संगीत की शक्ति


 संगीत की शक्ति


        ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण मानव जगत् में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। जब ये प्रयोग जीवन के अभिन्न अंग बन जाते हैं, तब मानव पुनः अभिनव अनुसंधान में प्रवृत्त हो जाता है। यद्यपि संगीत स्वयं एक विज्ञान है, किन्तु अभी उसकी सिद्धि के लिए वर्षों की तपस्या अपेक्षित है। इधर कुछ समय से वैज्ञानिकों का ध्यान संगीत की ओर गया है, लेकिन संगीत के क्रियात्मक ज्ञान के अभाव के कारण हर वैज्ञानिक इस ओर ध्यान नहीं दे पाता।


      विज्ञान द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि द्रव्य (मैटर) और शक्ति ( एनर्जी), ये दोनों एक ही वस्तु हैं। 'मैटर' को 'एनर्जी' और 'एनर्जी' को 'मैटर' में परिवर्तित किया जा सकता है, अर्थात् परम तत्त्व एक ही है। अतः शब्द का प्रभाव बड़ा विलक्षण है। जिस प्रकार मिट्टी का गुण 'गंध' और अग्नि का गुण 'उष्णता' है, उसी प्रकार आकाश का गुण 'शब्द' है। वह सदा आकाश में विद्यमान रहता है। इस सत्य को जान लेने पर कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि वे शीघ्र ही किसी उपकरण की सहायता से तानसेन का गायन अथवा भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से कही गई 'गीता' को आकाश तत्व से ग्रहण कर उन्हीं की आवाज़ में सुनवा सकेंगे।


         इंगलैण्ड की एक महिला एलियस ने संगीत द्वारा टेलीविज़न पर गिलास तोड़ने का आश्चर्यजनक प्रदर्शन किया था। स्टूडियो में काँच के चार गिलास रखे गए, जोकि मिस एलियस द्वारा तोड़े जाने वाले थे। एलियस ने गायन प्रारम्भ किया। हज़ारों मुनष्य अपने-अपने घरों में टेलीविज़न पर यह कमाल देख रहे थे। किन्तु एलियस स्टूडियो में रखे गिलासों को न तोड़ सकी। बाद में एक औरत ने टेलीविज़न को पत्र लिखा कि 'एलियस के एक ऊँचे स्वर ने मेरे घर के चार गिलासों को चटका दिया।' इसके पश्चात् अन्य लोगों से ऊँचे स्वर से टूट गए थे। स्टूडियो के कमरे गुंजन रहित होने के कारण ध्वनि का हुए गिलासों के 21 नमूने प्राप्त हुए, जोकि उनके घरों में एलियस के एक विशेष प्रभाव वहाँ के गिलासों पर पूर्णरूपेण नहीं पड़ सका था, इसीलिए वे नहीं टूटे अन्य लोगों ने अनेक पत्र टूटे ग्लासों के नमूने-सहित भेजे, तब प्रयोग की सफलता पर अत्यन्त आश्चर्य और हर्ष हुआ। युद्ध-काल में फौजी बैन्ढों को आदेश दिया जाता था कि पुल के ऊपर सेगुज़रते समय वे बैन्डों को न बजाते हुए तथा पदचापों में समानता न रखते ख़ामोशी के साथ चलें, क्योंकि स्वर के प्रभाव से पुल टूटने की आशंका रहती थी। 'टुथ' की आठवीं वॉल्यूम में एक स्थान पर कहा गया है कि कैप्टेन ओवर्ने ने एक बार तिब्बत की एक अन्धकारपूर्ण गुफा में प्रवेश किया था। उनका साथी एक लामा अपने साथ धातु निर्मित गोंग वाद्य ले गया था। जब वे लोग अन्धकार में प्रविष्ट हुए, तब लामा ने अपने बाद्य को लकड़ी के 'हमर' से बजाना शुरू किया। कैप्टेन का कहना है- 'मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि बाथ की टंकार से आधा दर्जन के लगभग हरे प्रकाश की किरणें प्रस्फुटित हुई, जिनका प्रकाश 500 कैण्डिल पावर से किसी भी प्रकार कम नहीं था।' इस प्रकार संगीत की रोशनी में उन्होंने कई गुफाएँ देखीं। सम्भव है, प्राचीन काल में अजन्ता और एलोरा की गुफाओं की बारीक कला के निर्माण में भी संगीत का आश्रय लिया गया हो, क्योंकि कई स्थलों पर इतनी बारीक चित्रकारी देखने को मिलती है जो साधारण प्रकाश में पूर्ण करना असम्भव है और आग के प्रकाश द्वारा इसलिए सम्भव नहीं कि उसके हुए धुएँ से उसके नष्ट और खराब होने का भय रहता है। भारतीय संगीत - साहित्य में तानसेन से सम्बन्धित कई चमत्कारिक किंवदन्तियाँ हैं, जिनमें से दीपक राग द्वारा दीपक जला देना, मेघ राग द्वारा वृष्टि कराना और स्वर के प्रभाव से हिरन आदि पशुओं को पास बुला लेना मुख्य रूप से प्रचलित हैं। इसी प्रकार ग्रीक-साहित्य में ऑरफेन्स का वर्णन मिलता है, जो संगीत के प्रभाव से चराचर जगत् को हिला देता था, समुद्र की उत्ताल तरंगों को शांत कर देता था और वायु के वेग को रोककर पर्वतों को गति दे सकता था। आजकल कुछ वैज्ञानिक पशु-पक्षी और कीड़े-मकोड़ों के संगीत को भी रिकॉर्ड कर रहे हैं। इससे उन्हें संगीत प्रभाव के अनुसंधान में सहायता मिलती है। लुडविगकौश ने पक्षियों के स्वरों का अध्ययन किया और चीन के चाँग पो ने कीड़ों के संगीत के अनेक रिकॉर्ड तैयार किए। उनका कहना है कि मच्छरों को संगीत से बेहद प्रेम होता है। गर्मी के दिनों में बिजली पैदा करने वाले यंत्र की मधुर आवाज़ पर असंख्य मच्छर अपने प्राणों की भेंट चढ़ा देते हैं। मकड़ियाँ अच्छा संगीत सुनकर उसके पास खिसककर आ जाती हैं। पेलीसिन नामक फ्रेंच लेखक जेल में बाँसुरी बजा-बजाकर मकड़ियों को अपने काफी निकट तक बुला लिया करता था।


        चीन के प्रमुख समाचार पत्र 'पीपुल्स डेली' की एक रिपोर्ट में कहा गया कि तैयुआन के एक डेरी फार्म में कोमल और हलके संगीत का आयोजन करने से गाएँ अधिक दूध देने लगीं। शांसी प्रांत के श्रमिक- डेरी फार्म ने दूध देने वाली अपनी 45 गायों के दूध का दैनिक औसत 444.5 किलोग्राम से 514.5 किलोग्राम कर लिया। उनकी चारा वगैरह की अन्य सुविधाओं में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था।सिंह जैसे हिंसक पशु पर प्रसिद्ध गायक पं० ओंकारनाथ ठाकुर ने लखनऊ के चिड़ियाघर में एक प्रयोग किया था। शेर के निकट जाने पर उसका हिंसक भाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था, किंतु कोमल गांधार के विशिष्ट प्रयोग द्वारा उसकी आँखों में कुछ ही देर बाद परिवर्तन आ गया। कुत्ते की तरह वह अपनी पूँछ हिलाने लगा और उसकी आँखों से वात्सल्य प्रकट होने लगा।


       सर जे.सी. बोस ने वनस्पति शास्त्र सम्बन्धी विशेष अनुसंधान के द्वारा प्रमाणित कर दिया कि वनस्पति में भी जीव है। पं० ओंकारनाथ ठाकुर ने उनकी प्रयोगशाला में जाकर एक बार भैरवी गाई थी। गाने से पूर्व यंत्रों द्वारा पौधों व पत्तियों की अवस्था देख ली गई थी और गायन के पश्चात् उन पर आई हुई नई चमक का दर्शन भी लोगों ने किया था। मधुर स्वर सुनकर वृक्षों के 'प्रोटोप्लाज्म' के कोष में स्थित 'क्लोरोप्लास्ट' विचलित और गतिमान हो उठता है। दक्षिण की प्रसिद्ध अन्नामलाई यूनिवर्सिटी में बॉटनी विभाग के कुछ छात्रों ने संगीत द्वारा पौधों पर अद्भुत प्रभाव डाला। एक ही क़िस्म के दो पौधे तैयार किए गए। एक पौधे को स्वरों द्वारा कई दिन तक प्रभावित किया गया और दूसरे को प्राकृतिक अवस्था में स्वतंत्र रहने दिया गया। प्रयोग के पश्चात् देखा गया कि जिस पौधे को संगीत सुनवाया गया था, वह दूसरे की अपेक्षा सवागुनी गति से बढ़ रहा था। प्राचीन मिश्र में संगीत की शक्ति के द्वारा पागलों का उपचार किया जाता था। डॉ० लक्ष्मीनारायण गर्ग ने अपनी पुस्तक 'संगीत द्वारा रोग चिकित्सा' में विभिन्न रागों द्वारा बीमारियों का उपचार करने पर विस्तृत प्रकाश डाला है। क्लोरोफार्म की अपेक्षा किसी भी गंभीर नाद द्वारा मस्तिष्क की नाड़ियों को सुषुप्त किया जा सकता है। इस प्रकार औषधि और शक्ति, दोनों ही रूपों में यह कला प्रयोज्य है। संगीत के प्राचीन ग्रंथों में राग-रागिनियों के स्वरूप और उनके ध्यान की चर्चा मिलती है। उनका अभिप्राय है कि राग-रागिनियों का शुद्ध रूप से ध्यान और गान करने पर उनका रूप साकार हो उठता है। श्रीमती वाट्स ह्यूग ने वर्षों के अनुसंधान द्वारा लॉर्ड लीटन के स्टूडियो में ध्वनि आकृतियों को विशेष गायन प्रारंभ किया तो दर्शकों ने देखा कि प्रस्तुत प्रत्येक स्वर एक विशेष दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया था। उन्होंने एक साधारण वाद्य 'ईडोफोन' पर आकृति में सामने आता है।


जाने की कथाएँ प्रचलित हैं। उन पर बिल्कुल विश्वास न किए जाए, यह भी प्राचीन काल में साम-गान के मंन्त्रों द्वारा देवताओं का आह्वान किए उचित प्रतीत नहीं होता अतः आवश्यकता गंभीर चिंतन, श्रद्धा और खोज की है।



Post a Comment

0 Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top