उस्ताद अमीर हुसेन खाँ

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उस्ताद अमीर हुसेन खाँ


                 मेरठ जनपद के वनखेडा में सन १८९९ में प्रख्यात सारंगी वादक अहमद बख्श के पुत्र रूप में जन्में अमीर हुसेन खाँ ने संगीत की शिक्षा घर में ही पाई । इन्होने प्रारम्भिक शिक्षा हैदराबाद में अपने पिता से प्राप्त की, जिन्हें हैद्राबाद का राजाश्रय प्राप्त था । उस्ताद मुनीर खाँ, अमीर खाँ के मामा थे, अतः अमीर खाँ की तबले की सोच और बढ़ती रूचि से प्रभावित होकर उन्होंने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। चूंकि, मुनीर खाँ मुम्बई में रहते थे, अत: किशोरवयी अमीर हुसेन खाँ ने शिक्षा का क्रम सुचारू रूप से जारी रखने हेतु मुम्बई में रहने का निर्णय लिया और १९१४ में वह मुम्बई आ गए। सन १९२४ में प्रख्यात पखवाज वादक और कला पारखी रायगढ़ नरेश चक्रधर सिंह के दरबार में अपना तबला वादन प्रस्तुत करके अमीर खाँ ने अपनी प्रतिमा का परिचय दिया और काफी मान-सम्मान पाया। यहीं से इनकी लोकप्रियता बढ़ी ।


                 अमीर हुसेन खाँ की कर्मभूमि मुख्यतः मुम्बई ही रही। महाराष्ट्र में जो तबला आज बज रहा हैं, उसकी नींव डालने और जमीन तैयार करने में उस्ताद ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन, दुर्भाग्यवश संगीत जगत् इस अप्रतिम विद्वान और इनकी कला का सही मूल्यांकन नहीं कर पाया। खाँ साहब एकल और संगति दोनों में हीनिपुण थे । किन्तु जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने संगति का क्षेत्र छोड़कर मात्र स्वतंत्र वादन जारी रखा। उस्ताद अमीर हुसेन ने सैकड़ों नवीन रचनायें तैयार करके तबला वादन के क्षेत्र को समृद्ध किया था । इनके बनाये कायदों, रेलों और गतों में इनकी प्रखर रचनात्मक क्षमता का प्रमाण मिलता हैं। वस्तुतः उस्ताद अमीर हुसेन खाँ एक नायक थे। वे जितने कुशल वादक थे, उतने ही अच्छे गुरू और उतने ही विलक्षण रचनाकार । तबले की बंदिशों में अन्य अवनद्ध वाद्यों के वर्णों का सुंदर समावेश करके भी उस्ताद ने अनेक रचनायें तैयार की थी। जिससे तबले का भंडार समृद्ध हुआ हैं।


               दिल्ली और फर्रूखाबाद घरानें के इस सिद्धहस्त विद्वान कलाकार का १९६१ में अखिल भारतीय गान्धर्व महाविद्यालय मंडल ने सम्मान किया था। इनके स्वतंत्र वादन का लाँग प्ले रिकार्ड भी है। खाँ साहब जितने विद्वान कलाकार थे, उत्तने ही योग्य शिक्षक भी। इनके कई शिष्यों ने संगीत जगत में अच्छी ख्याती प्राप्त की। इनमें से कुछ नाम इस प्रकार है - पद्मभूषण निखिल ज्योती घोष, पं. अरविंद मुलगांवकर, पं. पंढरीनाथ नागेशकर, गुलाम रसूल, सुधीर संसारे, शरीफ अहमद, धीना मुमताज, बाबासाहेब मिरजकर, इक्बाल हुसैन, श्रीपाद नागेशकर, पांडुरंग सालुंखे, आनंद बोडस और डॉ. आबान ई. मिस्त्री । ५ अगस्त १९६९ को मुम्बई में यह विद्वान कलाकार चिरनिद्रा में लीन हो गया। इनके सुयोग्य पुत्र फकीर हुसैन भी योग्य ताबलिक थे।


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